dynamicviews

Tuesday, 16 September 2014


मकान नम्बर डी 5, सेक्टर 31 





सर्वमंगला मिश्रा


सांसे टूटती रहीं, लोग बिलखते रहे, हम हंसते रहे, लोग मरते रहे।
वक्त पल्टा-एहसास बदला-
आज मेरी सांसे टूटती हैं हर पल,
लोग हंसते हैं, हम तिल तिल मरते हैं।
एहसास का आलम अब मुझमे समाया है,
जश्न ए मौत का एहसास अब समझ आया है।

पूरा शरीर जल चुका है मोदी के हाथ तो सिर्फ बचा हुआ अधजला पैर हाथ लगा है। पर न्याय की आस अभी बाकी है तो मैक्स के पिता निश्चिंत दिखे कि फांसी आज नहीं तो कल होनी ही है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने सजा सुना दी है। राष्ट्रपति ने दया याचिका खारिज़ कर दी है तो कितने दिन न्याय टलेगा ?? इसलिए हमें न्याय की उम्मीद अभी भी है।


11 साल, साढ़े 5 साल, 3 साल और न जाने कितनी गिनतियां गिनूं सारी गिनतियां परिजनों के मात्र मस्तिष्क में याद की तरह पल रही है। इनमें से  ज्योति की तस्वीर अंदर रखी थी किसी बैग के अंदर तो मैक्स की तस्वीर दीवार पर टंगी मिली। पर हर्ष जो मात्र 3 साल का था परिवार जनों को सदा के लिए शोक में डूबो कर न जाने कहां चला गया।
इस देश में बलात्कार और मासूमों के अपहरण करने वालों के लिए तालिबानी फरमान होना चाहिए। शिवपाल यादव मिलने आये थे उन दिनों। हमें सरकार ने मुआवजा भी दिया। सरकारी नौकरी देने की बात भी कही थी पर आज तक तो मिली नहीं, अशोक ने बताया। तो अपना सबकुछ दांव पर लगा चुके झब्बूलाल जी आखिरी दम तक लड़ने को कटिबद्ध दिखे। सरकारी मुआवजे से अपनी रोजी रोटी की छांव तो बचा ली और जो बाकी पैसे थे उसे केस लड़ने में लगा दिया। दो प्लाट बिक चुके हैं तो बचे हुए प्लाट भी लगाने से पीछे न हटने की कसम खाये ज्योति के पिता अपने धीरज और मां के धैर्य का बांध आज भी मजबूती से खड़ा है। हर तूफान से भिड़ने के लिए।
“धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी
आपत काल परखियहिं चारी “ यह पंक्तियां यूं तो रामचरितमानस की हैं पर जिस सिलसिले में आज यहां जिक्र करने जा रही हूं वह आप सबके जह़न में कहीं न कहीं आपके मानसिक संतुलन को एक सेंकेन्ड के लिए या एक पल के लिए ही सही विचलित जरुर कर देगी। साल 2014 में हम सांस ले रहे हैं। उन रास्तों और गलियों में आज भी ज़िंदगी पल रही है। बच्चे पल-बढ रहे हैं। लोग काम कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। पर दिसम्बर 2006 का वो साल जिसने दिल्ली से सटे नोएडा के डी -5 सेक्टर 31 का वो घर जहां आज ना कोई पुलिस पहरा है ना कोई आतंक का साया। पर आज भी वहां के दहशत के दिन याद करते वो मां बाप जिनके कलेजे के टुकड़े को छीनकर मोनिन्दर सिंह और सुरेन्द्र कोहली ने सदा के लिए बेचैन कर दिया है। इस घर से जब कंकालों, लाशों के साथ आंखें, हाथ और पैर जब नाले और उस घर के अंदर बने कुंए से निकले थे तो ऐसा भी कुछ दुनिया में होता है यह सोचने को हर आंख मजबूर हो गयी थी। पायल, जिसकी गुमशुदगी और मौत से इस रुह कंपाने वाले सच का खुलासा हुआ था। जिससे दिल्ली, नोएडा नहीं बल्कि पूरा देश थर्रा गया था। जिसने 3 साल के बच्चे से लेकर 50-55 तक की महिलाओं को भी नहीं बख्शा। बच्चों  और महिलाओं के कपड़े तो मिले थे कुछ खून से लथपथ तो कुछ ऐसे ही पर गुर्दे, कीडनी का ये सेलर मोनिन्दर सिंह पंढेर को आज तक सजा नहीं मिली है। जिससे ज्योति के पिता और झब्बुलाल जी यह कहते नहीं थकते कि वही असली गुनाहगार है। सी बी आई पर भी उन्हें भरोसा नहीं रहा पर हां वो कहते हैं उन्हें मोदी सरकार से जरुर आशा है कि उन्हें और उनके जैसे बाकी माता पिता को न्याय जरुर मिलेगा। ज्योति कक्षा 5 की मेधावी छात्रा थी। अपने भाई बहनों में 5 वें नम्बर की थी। उसके पिता की आंखें भर आयीं ये कहते कि ज्योति अपने बड़े भाई अर्जुन को बताती थी कि कैसे पढाई करनी है। ज्योति की मां सुनीता देवी कहती हैं कि उनकी बेटी डाक्टर बनना चाहती थी। उन्नाव के गंजमुरादाबाद का रहने वाला यह परिवार 20 साल से यहीं अपना गुजर बसर कर रहा है। उन्होंने बताया कि उनके पास दो तीन महीने में पठानी पायजामा कुर्ता और शर्ट्स धोने और आयरन करने के लिए आती थीं। पर उन्हें यह पता नहीं था कि वो कपड़े किस दुराचारी के हैं। महिलायें जब गुम होती थीं तब लोग यह सोचकर बैठ जाते थे कि किसी के साथ अफैयर चल रहा होगा जिसके फलस्वरुप लड़की भाग गयी होगी। पर जब खुद पर विपदा आयी तब समझ आया कि असली दर्द क्या होता है। आज झब्बुलाल के तीनों बेटे काम कर रहे हैं एक बेटी ब्यूटी पार्लर में काम भी कर रही है। पर आह हर उस शक्स के अंदर जैसे पल-पल पल रही है। सालों बीत गये तकरीबन आठ साल पर हरियाणा की जन्मी करनाल में पली- बढ़ी -पीला दुपट्टा सिर पर ओढे उस बूढी महिला जो आज भी उस इलाके में सफाई का काम करती हैं। कहती है बेटी मेरा नाम जानकर क्या करोगी, मेरी फोटो खींचकर क्या करोगी हम तो बस यहां काम करते हैं। इतना लिखना कि उस मोनिन्दर को फांसी मिलनी ही चाहिए। हम सब यही चाहते हैं। सुरेंद्र को मिली तो क्या मिली जड़ को खत्म करो पेड़ के तनों को काटने से क्या होगा। उस रोड को क्रास करके जैसे ही मैं अन्दर पहुंची। बारिष के मौसम के कारण थोड़ा कीचड़ और पानी का बिखराव अधिक था पर जब मैं मैक्स के घर पहुंची तो उसके माता पिता बाहर ही मिल गये। उनका भरा पूरा परिवार भी मिला। बस एक की कमी ने उस मां को जरुर रुला दिया। जब उपर के घर के एक कमरे में मैक्स की तस्वीर मुझे दिखा रही थीं तब बताते बताते आंसू झलके तो रुके नहीं। मैक्स की मां कहती हैं कि उसका सारा सामान मैंनें बंद करके रख दिया है। खोलने की हिम्मत नहीं होती क्योंकि ये तस्वीर ही सुबह शाम इतना रुला देती है। मैक्स के पिता अशोक कहते हैं कि वो तो जूस पीने गया था शाम  को, पर लौटा नहीं।
सुनहले बाल, लम्बी स्कर्ट और छोटा टाप पहने पंढ़ेर की पत्नी कुछ दिन ही दिखी फिर कभी नहीं। सुबह शाम एक छोर से अपने घर के पास तक रोज अपने डागी को घुमाता भी था। उसे देखने वाले तो रोज या कभी कार देखते थे पर यह एहसास क्या आभास भी नहीं हुआ कि इस इंसान के अंदर एक दैत्य छुपा हुआ है।
मैक्स के पिता अशोक समझाते हुए कहते हैं कि मानलिजिए मैंने अपनी दुकान में एक आदमी रखा उसने 1000 रुपये का सामान बेचा दिनभर में। जब हिसाब में 500 रुपये अगर गायब होते हैं तो क्या मैं नहीं पूछूंगा कि हिसाब में गड़बड़ी क्यों है कहां गये पैसे। वैसे ही मोनिन्दर को कैसे पता नहीं था कि उसके घर में क्या हो रहा है। ऐसे लोगों को चौराहे पर खड़ा कर फांसी देनी चाहिए। तभी उत्तर प्रदेश में जुर्म रुक सकेगा वरना मुश्किल है।
यूं तो बिहार के बक्सर में मौत की रस्सी बनायी जाती है फिर फांसी का फंदा तैयार होता है। पर अब शायद किस्मत कुछ दिनों के लिए और मेहरबान हो गयी है। इंसान ही इंसान का दोस्त है तो इंसान ही इंसान का परम शत्रु भी। जिस इंसान ने इतने मासूमों, बच्चों और महिलाओं को न जाने कैसे मौत के घाट उतार डाला उसे अब पवन जल्लाद मेरठ की जेल में फांसी पर 12 सितम्बर को लटकाने वाले थे। 9 सालों से किसी को फांसी नहीं दी गयी थी। जिससे वहां 72 किलो के पुतले को फांसी पर लटकाने का कृत्य किया गया। फोन पर पवन ने हमें बचाया कि जिसने इतने लोगों को मारा उसे मारने में उन्हें कोई तकलीफ नहीं। पर सुरेंद्र कोहली अभी कुछ दिन और सांस लेगा इस धरती पर न जाने क्यों?
बच्चों पर हर पल नजर रखनी पड़ती है। अब स्कूल छोड़ने से लेकर लाने तक किसी पर भी भरोसा नहीं होता। निठारी हत्याकांड खुलासे ने हमें झकझोर कर रख दिया था। हमने घर पर स्ट्रीक्ट रुल्स बना दिये थे। किसी को भी कहीं अकेले आने जाने की आज तक कोई छूट हमने नहीं दी है- प्लाईवुड के विक्रेता अभिषेक गुप्ता कहते हैं। इस नोएडा निवासी ने बड़ी कश्मकश के साथ इस बात का जिक्र का किया कि 2006 का साल और आज सितम्बर 2014 है हमने एक भी नया कस्टमर नहीं बनाया। निठारी के नाम से ही लोग यहां नहीं आना चाहते हैं। सालों से बसे अब और कहीं नये सिरे से काम करने की ताकत नहीं रही जिससे मजबूरी में यहीं से रोजी रोटी चलानी है। उन दिनों हमारा व्यापार बहुत प्रभावित हुआ था। लोग यहीं रोज धरना दिया करते थे। मीडिया का हूजूम लगा हुआ था। हमने भी आवाज उठायी पर फिर व्यापारियों ने मिलकर अपनी अपनी दुकान खोलने का फैसला किया। जीवन भी तो चलाना था ना।

मीडिया की अहमियता निठारी निवासी आज भी मानते हैं। मीडिया ने हमारी बहुत मदद की। पर पुलिस विभाग से आज भी नाराजगी है। पहले रिपोर्ट दर्ज नहीं हुआ करती थी। मकान अब सीज़ है बगल का मकान डी 4. सेक्टर 31 में वकील साहब रहते हैं पर उस समय भी उन्हें यही कहते सुना गया था कि उन्हें कुछ नहीं पता। पर पूरी दुनिया को उसके काले कारनामों का आर्गन स्मगलिंग और ना जाने क्या- क्या होता था उस घर में। 
जब कोई आपको छोड़ कर चला जाता है या परिस्थिति वश दूर हो जाता है तो मिलने की आस बची रहती है । इंसान स्वयं को सांत्वना देकर जी लेता है। पर, अगर कोई कभी वापस न आने वाला हो, आपको हमेशा के लिए छोड़कर चला गया हो तो जीना दुश्वार हो जाता है। पर जीता हुआ दूर रहता है तो पल पल इंसान रिस रिस कर मरता है और जो नहीं रहा उसकी याद तड़पा तड़पा कर जीवन भर रुलाती है। अब वो बच्चे लौटकर वापस नहीं आने वाले। पायल के पिता या परिवार के विषय में स्थानीय लोगों को कोई सूचना भी नहीं कि उसका परिवार कहां है और क्या कर रहा है। पर आज यह सभी माता पिता अपने लिए नहीं समाज के लिए लड़ रहे हैं। ताकि दूसरा कोई मोनिन्दर पैदा न हो। इन सभी परिवारों ने ने अब तक धीरज, धर्म के साथ कौरवों के खिलाफ लड़ाई छेड़ी है। धर्म की लड़ाई में देर जरुर होती है पर आखिरकार जीत सच्चाई की ही होती है।

Sunday, 14 September 2014

क्या होगा बंगाल का??
-सर्वमंगला मिश्रा-स्नेहा


पं. बंगाल अपने गौरवपूर्ण इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। बंगाल देशभक्ति, कला –संस्कृति और साहित्य के लिए जाना जाता है। बंगाल अंग्रेजों के शासनकाल में देश की राजधानी थी। बंगाल जिसने ज्योति बसु के नेतृत्व में खुद को सुरक्षित महसूस किया और अब 34 वर्षों के शासनकाल की नींव को झकझोर देने वाली ममता दीदी के राज में बंगाल कहीं क्या दिशाहीन हो गया है ??
जबसे केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी का आगमन हुआ है क्षेत्रीय पार्टियों की बौखलाहट अब चिंतन में नहीं एक्शन में परिवर्तित हो रही है। जीता जागता उदाहरण बिहार है। जहां राजद और जेडीयू ने दस में से छह सीटें जीतकर अन्य पार्टियों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दे डाली है। पासवान के सुपुत्र चिराग पासवान ने जहां लोकसभा चुनावों के पहले समझदारी दिखायी वहीं इन दो बुजुर्गों ने उप-चुनाव से पहले पहल कर डाली। अब आक्सीजन तो हर पार्टी को चाहिए जीने के लिए। सुगबुगाहट तो सपा और बसपा के गठबंधन की भी है। सवाल सत्ता का जो है। बंगाल की सत्ता जिसके लिए अपने कालेज की युवा नेत्री ने ज्योति बसु की गाड़ी पर भीड़ को चीरते हुए झंडा गाड़ने का दम दिखाया था। तब से लेकर 2011 जब वो सत्ता पर आसीन हुई तब तक।पर सवाल उठता है कि बंगाल में आज कौन रहता है ? बंगाल में आज बड़ाबाजार, अलीपुर, गोड़िया जैसे इलाकों को छोड़ दिया जाय तो नये कोलकाता यानी राजारहाट,साल्ट लेक जैसे इलाकों में कौन रहता है? रिटायर्ज आफिसर्स, बूढे बुजुर्ग दम्पत्ति, जो आराम से बुढ़ापा काटना चाहते हैं। कहां हैं नवयुवक जो बंगाल को उन्नति के पथ पर लेकर अग्रसर होंगे। कहां है जगदीश चन्द्र बोस, कहां है सुभास चन्द्र बोस?? आज बंगाल देश के किस पायदान पर खड़ा है। इसका आंकलन शायद आपको चौंका दे। आज युवा वर्ग शिक्षा और रोजगार की तलाश में दिल्ली, बैंगलोर और मुम्बई जैसे इलाकों में अपना भविष्य तलाशते हैं। राज्य के युवा बेहतर शिक्षा संस्थानों के अभाव में दिल्ली,बैंगलोर, चेन्नई के चक्कर काटते हैं तो भविष्य बंगाल में अंधकारमय नजर आता है इसलिए बेहतर जीवन शैली और रोजगार के बेहतर,सुलभ साधन ढूंढते युवा अपना घर छोड़कर बाहर निकलते चले जा रहे हैं। इन्हीं बातों के मद्देनजर तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्या ने एक बार लोगों को आश्वश्त किया था कि ऐसे शिक्षण संस्थानों को बढ़ावा दिया जायेगा जिससे नवयुवकों को राज्य छोड़कर बाहर न जाना पड़े। पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। इंजीनियर्स बैंगलोर और चेन्नई का रुख कर लेते हैं तो दूसरे क्षेत्रों वाले दिल्ली और मुम्बई जैसे शहरों में बसने लगे हैं। ऐसे में बंगाल का कर्णधार कौन होगा? पिछले कुछ सालों में केपजेमिनाई, विप्रो, टेक महिन्द्रा जैसी कंपनियों ने अपनी उपस्थति दर्ज जरुर करायी है जिससे साल्टलेक स्थित सेक्टर 5 के इलाकों में दूसरे शहरों से और राज्यों से आये लोग नौकरी कर रहे हैं जिससे मकान मालिकों को किरायेदार मिल गये हैं नोएडा , दिल्ली और मुम्बई की तरह। पर, जिसतरह टाटा के पांव उखाड़े गये उस तर्ज पर क्या बंगाल का औद्दोगिक विकास हुआ है? हाल ही में ममता बनर्जी सिंगापुर की यात्रा करके आयीं हैं। पांच सालों में सी एम साहिबा ने कितने उद्दोगों को सही तरीके से आमंत्रित किया। कितनी फैक्ट्रीज़ लगने वाली हैं जिससे बंगाल के लोगों को रोजगार की प्राप्ति हो सकेगी। गांवों में रहने वाले लोगों के पास आज कितनी नौकरियां हैं जिससे वो अपना और अपने परिवार का भरण पोषण ठीक से कर पाने में समर्थ हैं। ग्रामीण इलाकों में आज भी खेती ही एकमात्र सहारा है या छोटे मोटे रोजगार। पर वह पर्याप्त नहीं है जीवन यापन की दृष्टि से। मंहगाई जिस आसमान को दिन पर दिन छूती चली जा रही है और गैजेट्स का शौक परवान चढ़ता चला जा रहा है। ऐसी परिस्थति में विदेशी आतंकी मौके का फायदा उठाकर भोले भाले मासूम गांववालों का प्रयोग करते हैं। जिससे अज्ञानतावश, लालचवश या मजबूरी से विवश होकर उनके गुलाम बन जाते हैं। इसी तरह देश में स्लीपर सेल्स का नेटवर्क तगड़ा होता जाता है और हम जिस डाल पर बैठे हैं उसी डाल को काटते चले जा रहे हैं।
बंगाल जहां महिलाओं के सम्मान के लिए भी जाना जाता था। अब दशा विपरीत नजर आ रही है। दिल्ली, मुम्बई की हवा लग गयी है बंगाल को। पंचायतों के अजब- गज़ब फरमान। हाल ही में जलपाईगुड़ी की एक घटना सामने आयी जिसमें एक पिता अपने रेंट पर लिए गये ट्रैक्टर का कर्ज न चुका पाने के कारण गांव में सभा बैठी थी। जहां किसान अपना कर्ज चुकाने की मोहल्लत मांग रहे थे। जिसमें टी एम सी के वार्ड नम्बर 9 के की काउसिलर और उनके पति भी मौजूद थे। पर बात बढ़ी और पिट रहे पिता के लिए बेटी घर से निकलकर बाहर आयी और आग्रह किया कि- मत मारो मेरे पिता को। तभी उसके कुछ जानने वाले उसे वहां से हटाकर दूर ले गये। जिसके बाद उसकी नंगी लाश धूपगुड़ी के रेलवे ट्रैक पर पायी गयी। इससे भी घिनौना चेहरा बंगाल का कुछ महीनों पहले आया जहां गैर जाति के युवक से प्रेम और विवाह करने की सज़ा मस्तिष्क को झकझोर और रुह को कंपा देने वाली थी। पंचायत ने उसे गैर जाति में विवाह करने पर दंड के तौर पर आर्थिक दंड देने को कहा। जब उसने कहा कि उसके पास इतने रुपये नहीं है तो दिल दहलाने वाली सज़ा फरमान के तौर पर उस पंचायत ने सुनायी। रिश्ते में लगने वाले चाचा और भाईयों ने उसके साथ कुकर्म किया। यही था उस पंचायत का फरमान। क्या अब महिलायें बंगाल में सुरक्षित रह गयी हैं ? एक प्रमुख टेलीविजन चैनल ने रियेलिटि चेक बंगाल के सेक्टर 5 में किया। जहां जानी मानी विदेशी कंपनियां स्थापित हैं। एक कार को खड़ा कर उसमें से चीखें निकलती हुई महिला की किसी ने मदद नहीं की। हांलाकि वह एक टेस्ट था कि अगर सच में कोई महिला फंस जाये तो क्या बंगाल के लोगों में अब भी इतनी इंसानियत बची है कि आगे आयें और मदद की गुहार सुनें। सेक्टर पांच और उसके आस पास का इलाका काफी सुनसान सा रहता है। कमर्शियल इलाका है। जहां चहल पहल दिन में ही अच्छी खासी रहती है रात में सन्नाटा पसर जाता है। मुझे याद है आज से तकरीबन साढे 3 साल पहले हमारी एक सहयोगी रात को तकरीबन साढ़े आठ बजे निकली घर जाने को। साउथ की तरफ जाने वाले लोग अधिकतर शटल का यूज करते हैं। उपलब्धता की दृष्टि से भी और कम समय में अधिकतम दूरी भी तय हो जाती है। पर वह जिस शटल में बैठी उस गाड़ी के दरवाजे ड्राइवर ने तकनीकी तौर पर बंद कर दिये। जिसके बाद उसने आफिस फोन किया तो धर पकड़ के बाद उसकी निकटस्थ थाने में कंप्लेन दर्ज करायी गयी। पर क्या सभी का भाग्य हरबार साथ देता है। यह हाल है नए बसते हुए कोलकाता शहर का। तो बाकी इलाकों में दहशत क्या अपने पैर नहीं पसारेगी। गांवों का हाल उपर बंया कर ही चुकी हूं।
सूत्रों के हवाले से खबर छन छन कर आ रही है कि अब बंगाल के रिंग में रिंगमास्टर बनने के बाद उन्हें पुराने रिंगमास्टरों से हाथ मिलाकर चलने में परहेज नहीं। इस बात का तात्पर्य क्या है- कि इतने सालों तक सी पी एम के खिलाफ जो लड़ाई जनता के मन मस्तिष्क में उकेरी गयी वो मात्र आपकी कुर्सी की लड़ाई पाने का जरिया था। पार्टी की लड़ाई की तह में स्व आक्रोश छिपा था। हर बार रक्त-रंजित चुनावों के बाद ही बंगाल ने कुर्सी पर किसी को पदासीन किया है। 1997 का वो साल जब ममता के नाम की आंधी पूरे बंगाल में चक्रवात की तरह पनपी थी। पर सत्ताधारी सी पी एम ने ममता दीदी को पटखनी दी थी। हारा हुआ योद्धा और बूढा शेर जब गिरकर उठते हैं तो उसमें एक नयी आक्रामक शक्ति आ जाती है। वही ममता दीदी ने भी किया। धुंआधार ठीक मोदी की तरह अनगिनत जनसभायें उसमें जोरदार भाषण और देशभक्ति भरे गीतों से समापन करती थीं। पर कहां गयी अब वो देशभक्ति। कितने आई ए एस, आई पी एस निकले हैं ? कितने शोधकर्ता, वैज्ञानिक, डाक्टर और आई आई टी प्रोफेशनलस निकले हैं?
आज बंगाल में प्रापर्टी के दाम बढ़ रहे हैं।पर उसका आधार क्या है? वहां शिक्षा सामान्य, बिजनेस, नौकरी सामान्य जो पीढियों से करते और रहते चले आ रहे हैं। दाम कितने दिन बढेगें। सिर्फ दबंगई के बल पर शासन कितने दिन का। नये बसेरे बस तो रहे हैं पर पक्षी उड़ते चले जा रहे हैं। तो नये घरौंदे में रहता है कौन है और कौन रहेगा दीदी- ज़रा सोचिये।

Tuesday, 19 August 2014

पाकिस्तान
योर टाइम इज अप !!



-सर्वमंगला मिश्रा-स्नेहा

पाक यानी “पवित्र “  पर यथार्थ की व्यथा विपरीत है। भारत का ही हिस्सा आजादी के बाद अपनी स्वायत्ता चाहने वाला पाकिस्तान आज विश्व के समक्ष भारत का सबसे बड़ा दुश्मन बन चुका है। हिस्सेदारी की साझेदारी से आजतक नाखुश पाकिस्तान अपनी दावेदारी समय समय पर मुद्दे के तौर पर हथियार बंद तरीके से पेश करता चला आ रहा है। यह बात अलग है कि भारत साम दाम दंड भेद की परिभाषा जानता है। जिससे कहीं न कहीं पाकिस्तान के अंदर इस बात का भय सताता जरुर है। जिससे उसे कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ता है। पर, मकसद और मानसिकता में परिवर्तन का नामो निशान तक नहीं है। पाकिस्तान अधिकाधिक की चाह आज भी रखता है। जिससे वह कश्मीर के आधे हिस्से को पाकर संतुष्ट नहीं है। उसके अंदर आतंरिक कलह आज भी जिंदा है बांग्लादेश को खोने का। जो कभी ईस्ट पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था। भौगोलिक दशा और परिस्थितयां परिवर्तित हुईं और 1971 का युद्ध के बाद एक नये देश का जन्म हुआ जिसे बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है। जहां अमूमन 98 प्रतिशत बंगाली भाषा और संस्कृति को मानने वाले लोग रहते हैं औऱ 2 प्रतिशत में अन्य जातियां। इसी तरह की परिस्थतियां फिर पनप रहीं हैं कश्मीर को लेकर। हालांकि 1999 का कारगिल युद्ध को एक दशक जरुर बीत चुका है। पर, मस्तिष्क में अभी जख्म हरे ही हैं। मकसद यह नहीं कि पाकिस्तान आज भी भारत की ओर ललचायी निगाहों से देख रहा है। सवाल यह है कि वह अपने ही घर में आज भी असुरक्षित है। पाकिस्तान का इतिहास भारत से पुराना नहीं है। 1958 से आज तक फौज की हूकूमत समय समय पर तानाशाहों के पर कतरती आयी हैं। वहां की फौजी ताकत जग जाहिर है। जो रातोंरात शासक बन जाती है। उसी फौज का हिस्सा कभी परवेज मुशर्रफ भी थे जिन्होंने नवाज शरीफ को पलक झपकते दरकिनार कर दिया था और स्वयं राष्ट्रपति बन बैठे थे। लेकिन पाकिस्तान का मौसम ए हाल बदस्तूर परिवर्तनशील था है और शायद रहेगा भी। पाकिस्तान का रंगमंच प्रारंभ से निराला रहा है। राजनैतिक गतिविधियां जिस रुप में घटित होती हैं उससे विश्व के समक्ष क्या संदेश जाता है यह तो विश्व पटल पर एक एक करके पाकिस्तान की दासतां अंकित होती चली जा रही है। बेनज़ीर भुट्टो को पदच्यूत किया नवाज़ शरीफ ने, नवाज को पदच्यूत किया परवेज मुशर्रफ ने। लंदन में कारावास बीताने वाली बेनज़ीर भुट्टो ने उस समय आने का निर्णय किया जब नवाज शरीफ की गद्दी उनके हाथों से छीन गयी थी और परवेज मुशर्रफ उसके पाक की गद्दी पर अपने हक ए दासतां की कहानी रच चुके थे। ऐसे में नवाज़ और बेनजीर एक ही नाव पर सवार, एक ही विरासत के दो हक़दार होने के कारण एक दूसरे के दुश्मन ही रहे। दुश्मन-दुश्मन =दोस्त का फार्मूला फेल हो गया। वहीं सत्ता की लोलुपता से मुशर्रफ मुंह कैसे मोड़ लेते। फलस्वरुप 2007 में शरीफ को पाक की धरती पर कदम तक न रखने देने वाले मुशर्रफ आज शरीफ की तानाशाही के शिकार हैं। उन्हें तो कालेपानी की सज़ा सी मिल गयी है जहां वह बेनज़ीर और शरीफ की तरह देश से बाहर कदम ही नहीं रह सकते। उन्हें लंदन का वनवास भी नसीब नहीं होने दिया शरीफ़ ने। यह शरीफ की शरीफाई है। जो भारत के साथ भी पूरी शिद्दत से निभाये चले जा रहे हैं। कश्मीर का सपना उस ड्रीम गर्ल को पाने के सपने जैसा हो गया है। जिसे ड्रीम गर्ल तवज्जो ही नहीं देती। कश्मीर वो प्रेमिका बन गया है जिसकी चाहत में पाक हर हद से गुजरने की हुंकार भरता है। वहीं भारत अपनी बेटी को बचाने का हर संभव प्रयास और मुस्तैदी में कोई कसर नहीं छोड़ता क्योंकि अब यह आन बान और शान का मसला है। सुशासन की आवाज उठाने वाला कोई नहीं है पाकिस्तान में। तभी बेनजीर भुट्टो के नाम और राजनैतिक करियर को चमकता देख षणयंत्र ऐसा रचा गया कि चुनाव से पहले ही बेनजीर भुट्टो की सदा सर्वदा के लिए विदाई हो गयी। संघर्ष त्रिकोणीय से नेक टू नेक का संघर्ष बन गया।
खैर, यह तो इतिहास था भविष्य क्या है पाकिस्तान का?? 2013 में पाक में चुनाव के बाद नवाज शरीफ को खोयी विरासत तो मिल गयी पर, नजरें अभी भी तनीं हैं। इमरान खान जिन्होंने अपनी मां के नाम पर अस्पताल बनवाया, जो देश की कौमी ताकत को लेकर समय समय पर अपनी आवाज़ बुलंद करते रहे हैं और पाक में हो रहे अपराध ए दासतां बयां करते हैं जो आवाम की ताकत को तहेदिल से जमींदोज़ होने से बचाने की कवायत में जुटे हुए हैं। दूसरी तरफ विदेशी मुल्कों में जीवन बिताने के बाद कनाडा से वापस आये पर्यटक भी अपनी दावेदारी ठोंकने में जुट गये हैं। खतरा फिर पनप रहा है। नवाज के सिर पर क्योंकि फौज जिसने अपनी ताकत और हूकूमत की एक अलग कहानी विश्व के इतिहास में रच डाली है। उसे वह विस्तार जरुर देना चाहेगा। उधर इमरान खान की बेतहां इतेंहा का दौर खत्म होने का नाम न लेता देख समर का ऐलान दोनों दलों ने अमूमन कर ही दिया है। ताहिर उल कादरी और इमरान खान क्या एक डगर के दो साथी हैं या पहले की तरह विरोधी जोड़ियां ?? यह तो भविष्य ही खुलासा कर सकेगा। ऐसे में क्या पाक संसद के विरोधी दल के प्रमुख नेता इमरान खान और कादरी ने अल्टीमेटम तो दे दिया है ऐसे में क्या शरीफ फौजी ताकत का सहारा लेकर खान साहब को सिरे सरकाने में कामयाब होंगें या खान, कादरी और शरीफ की टक्कर में एक बार फिर फौजी ताकत को सत्ता हथियाने का मौका मिलेगा ? खुली चुनौती के साथ युद्ध का बिगुल बजाने वाले खान के सब्र का बांध टूट सा गया है। सत्ता पाने की मानसिक बाढ़ ने जुनून का रुप ले लिया है। अब रेड जोन क्रास होगा या सत्ता का समुंदर। क्योंकि योर टाइम इज अप!!  का उद्घोष इमरान खान ने एक रैली में चिल्लाकर अपने समर्थकों को कूच करने का आदेयस देकर शरीफ को आगाह किया कि बहुत हो चुका अब वक्त तुम्हारा खत्म होता है। यह चेतावनी है कि कुर्सी खाली करो कि जनता नहीं दूसरी पार्टी आ गयी है।
सत्ता के चौतरफा खेल में पाक की गद्दी फिर लड़खड़ाने लगी है। अपने ही घर में असुरक्षित रहने वाली सरकार विदेशी ताकतों के बल पर चलने वाली अपने गिरे बान में झांककर क्यों नहीं देखती। जो है उसे संभाल कर रख पाना चुनौती है तो जिसकी आस में सबकुछ दांव पर लगा देते हैं उसकी सुरक्षा कैसे करेंगें ? विदेशी हुक्मरानों की पैनी दृष्टि से ही पाकिस्तान के हौसले पस्त से हो जाते हैं। पाकिस्तान के राजनीति की बुनियाद खोखली और ठूंठ हैं। पाकिस्तान की दशा मोरनी के समान है जिसे अपने पैर निहार लेने चाहिए। पाकिस्तान, जो एक आतंकी गढ़ माना जाता है। जो आतंकवाद का ट्रेनिंग सेंटर है, जहां नेस्तोनाबूत करने की शिक्षा दी जाती है, जहां हिन्दूस्तानी हिन्दू आज भी खौफ के साये में जीते हैं, जहां मजहब की परिभाषा आतंक और जेहाद समझायी जाती है वहां की युवा पीढी किस सोच को लकर पल रही है, उसकी मानसिकता को रौंधा जाता होगा। पाकिस्तान आज अपने ही बिछाये जाल में फंसता चला जा रहा है। जहां विश्व के सबसे बड़े आतंकवादी को पनाह मिली थी जिसे अमेरिका ने अपनी ताकत के बल पर खदेड़ डाला। पर, जिद्दी पाकिस्तान हम नहीं सुधररेंगे की पगडंडी पर चलता है।
“बोया पेड़ बबूल का, आम कहां ते खाय “ पाकिस्तान को सेल्फ एनालिसिस करने की आवश्यकता है। फौज जो किसी भी शासक का हथियार होता है समाज-देश में शांति बरकरार रखने में। वही फौज यहां स्वयं सत्ता भोगी बन जाती है पर्याय यह है कि शांति बरकरार रखने के हथियार से ही शासक वंचित है। सेना अपने अस्तित्व को जिंदा रखने में यहां सफल देखी जा सकती है। पाकिस्तान दोस्ती की झाड़ से झांकता है जहां प्रेम और विश्वास कब्र में दफन हो चुके हैं। पर प्रेम, विश्वास और दोस्ती के पुतले आगेकर पाक धोखे का तोहफा ही पेश करता है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ समारोह में आकर पाक ने अपनी सूझ बूझ का परिचय जरुर दिया। जहां हाथ और हालात सामान्य दिखे पर दिल के जज्बात में दफ़न कहानी तो बाद में निकलकर आयेगी। क्योंकि सीजफायर की घटनायें उसके बाद से बढ़ती ही चली जा रही है। ऐसे में पाक की अवस्था डरने और डराने वाली हो गयी है जहां मात्र डेढ़ साल में ही ओपोजिशन ने चुनावी बिगुल बजा डाला है जिससे एक बार आपसी कलह का शिकार फिर एक बार हर बार की तरह आम इंसान ही चक्रव्यूह के चक्रवात में फंसता है। तो भारत पर अपना दबदबा दिखाने की झूठी शान से भी पाक पीछे नहीं हट पाता।    


   

Saturday, 19 July 2014

         
                          आस्था और अनुकरण

सर्वमंगला मिश्रा
9717827056

आस्था से श्रद्धा और श्रद्धा से विश्वास कायम होता है। जीवन अति सरल पर कठिन पाठ पढ़ाता है। धर्म में आस्था रखना और अंधानुकरण करना दो अलग बातें हैं। धर्म में आस्था रखना -इंसान के अंदर विश्वास, प्रेम और पथ प्रदर्शक बनने का गुण पनपाती है। तो अंधानुकरण करने वाले लोग बिना विचारे ढाक के तीन पात ही चल पाते हैं। उनमें मात्र कट्टरता की भावना रहती है। इंसानियत की मर्यादा समाप्त हो जाती है। धर्म मर्यादा पालन सीखाता है ना कि आपस में फूट डालता है।धर्म की मानसिकता एकता को मजबूती प्रदान करती है। द्वारका-शारदा पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानन्द जी महाराज ने साईं पूजा को हिन्दू धर्म के विरुद्ध बताया। हर बड़े चैनल पर उनका इंटरव्यू भी चला। साईं भक्तों ने आग बबूला होकर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानन्द जी महाराज का पूतला भी फूंक डाला। पर, ध्यान देने योग्य बात यह रही कि हिन्दू धर्म के समर्थकों ने साईं का पुतला न फूंका और ना ही अनैतिक कदम उठाये। मसला यह है कि सामाजिक कुरीतियों से बचाना समाज के लोगों को यह धर्म गुरु का काम होता है। हम सभी लोग अपने बचपन में अपने बड़े –बजुर्गों से यही सुनते आये हैं कि अच्छे लोगों की संगत करो। इससे आपमें अच्छे गुण पनपते हैं। यह जीवन है जहां इंसान को कदम कदम पर भिन्न- भिन्न गुरुओं की आवश्यकता पड़ती है और एक ही गुरु से जीवन चल तो सकता है पर आज जिंदगी की लाइफस्टाइल चेंज़ हो जाने से जीवन के पहलू को देखने और सोचने का नजरिया भी बदल सा गया है। इसलिए जैसे हर विषय के लिए बच्चा अलग अलग टीचरों से ट्यूशन लेता है उसी तरह जीवन को भी अलग अलग डाक्टर से कंस्ल्ट करना पड़ता है। हालांकि पहले गुरुकुल में एक ही गुरु अपने सभी शिष्यों को उनके समर्थता के आधार पर विकसित करते थे और जीवन के मार्ग पर चलने में कठिनाइयों का सामना कम करना पड़ता था। उसी तरह 33 करोड़ देवा देवता हिन्दू धर्म में बताये जाते हैं। पर क्या उन 33 करोड़ देवी –देवताओं के नाम भी हम जानते हैं ?? जाहिर सी बात है उत्तर ना ही निकलेगा। उसी तरह साईं बाबा, गुरुनानक जी, मुहम्मद पैगम्बर और जिसस क्राइस्ट ये सभी आज परमपूज्य और साधना के प्रेरणास्त्रोत हैं। वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह...आमीन....ओ जिसस- मे गोड बेल्स यू माई चाइल्ड जैसे कई आस्थावान शब्द  और वाक्य है जो आपके मन के अंदर एक अद्भुत ऊर्जा का संचार करते हैं। उस अविश्वसनीय, परम शक्तिमान और जगत संचालक को किसी ने नहीं देखा। वो सुप्रीम लार्ड है, भगवान है, जगत विधाता, शिव, ब्रह्मा या विष्णु रुपेण है..या अल्लाह, गुरुनानक साहेब या जिसस है । हममें से किसी को नहीं पता। पर एक परम शक्ति है कहीं न कहीं जो इस जगत का संचालन करती है। हमें नदी की धारा के सामान गोमुख से निकालकर महासमुद्र में विलीन कर देती है। यही सत्य है।

जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानन्द जी महाराज के साईं पूजा का विरोध मात्र विरोध नहीं था। एक पहल एक आगाह था जो हिन्दू अपने धर्म से भटक रहे हैं उनके लिए। उनका कहना यही रहा कि साईं को आप मानो मुझे कोई आपत्ति नहीं पर हिन्दू शास्त्रों में वर्णित देवी देवताओं का स्थान उनसे निम्न मत करो। साईं –राम , साईं कृष्ण, साईं-श्याम मत कहो। यदि आप को भजना है तो साईं का नाम सांई की तरह लो। उसमें राम-कृष्ण मत जोड़ो। पर बेबाक मीडिया थोड़ा मुखर हो गया। इसे चढ़ावा और साईं से शंकराचार्य का टकराव घोषित कर दिया। संत होना अलग बात है पर परमात्मा बनना अलग बात है। सनातन धर्म में वैसे ही इतने शास्त्र, पुराण और वेद होने के कारण वैचारिक मतभेद आपस में संकीर्णता को जन्म दे चुके हैं। ऐसे में स्वामी नारायण की पूजा, शिरणी के साईं की पूजा अपने आप में आने वाली पीढियों को भ्रमित करने वाली है। मेरे पिताजी आज से अमूमन 42 अथवा 45 वर्ष पूर्व देवरहवा बाबा से मिल चुके हैं। अद्भूत, चमत्कारी, मचान पर रहना, खड़ाऊं पहनना, स्पृश्यता एकदम वर्जित, हर आधे घंटे में स्नान करना, इच्छा मन में की और उत्तर तुरंत पा जाना। पर आज उनका कोई मंदिर या धाम नहीं है। बहुत लोग शायद उनके विषय में सुने भी नहीं होंगे। इसी तरह फहरिस्त काफी लम्बी है। गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी इन्हें हम संत और धर्म प्रदर्शक के रुप में जानते और मानते हैं। साईं बाबा जिनके पूरे विश्व में करोड़ों अनुयायी हैं कुछ काल पूर्व ही उनका शरीर पंच तत्व में विलीन हुआ। उनका कोई मंदिर नहीं। पर आज उनके अनुयायी ट्रस्ट का पैसा लगाकर मंदिर खोलें और उन्हें भगवान के रुप में स्थापित कर दें तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। पर क्या जानने वाले ज्ञानी क्या इस अनछुए पहलू से अनभिज्ञ हैं  ??  निर्मला देवी जिन्होंने खुद को ईश्वर स्वरुपा बताया और लोगों के घरों से देवी देवताओं की मूर्तियां तक हटवा दी, और स्वघोषित ईश्वर के रुप में आज भी कई घरों और मस्तिष्क में विद्दमान हैं। एक और स्वघोषित ईश्वर की बात न की जाय तो बात अधूरी रह जायेगी। वो हैं आशाराम बापू- जो आजकल किस कारण जेल में हैं इस बारे में बात करना समय की नष्टता होगी। ओशो- जिसकी बातें और नाम आध्यात्म जगत में पूजा है। करोड़ों भक्त उनकी आस्था के सागर में गोते लगाते हैं। उनकी पुस्तकें पढ लेने मात्र से- जीवन का सार और स्वर्ग की अनुभूति उनके लिखित विचारों से झलकती है। पर क्या वो ईश्वर थे??  आजकल एक नाम जिसकी कश्ती डूबी पर लक्ष्मी मैया ने फिर उन्हें सहारा दे दिया है। निर्मल बाबा जो व्यापार में फेल हो गये थे पर आज दूसरों पर ईश्वरीय कृपा कैसे होगी सरल भाव में बताते हैं। उनके अनुयायी जिनकी आस्था कहीं न कहीं प्रबल है या जिंदगी को राह देने वाली मशीन पर एक भरोसा उमड़ा हुआ है। कहा नहीं जा सकता। तो क्या ये ईश्वर हैं??
सचिन तेंदुलकर-क्रिकेट के भगवान, रफी साहब, लता मंगेशंकर इन्हें आज के युग का सर्वश्रष्ठ माना जाता है। देश नहीं विदेशों में भी पूजे जाते हैं। अपने कर्म के लिए। पर अपवाद यहां भी है- एक बार पढा था ,जब माधुरी दीक्षित का बहुत बोलबाला था, तो एक पान वाला दुकान खोलने के साथ सबसे पहले उनकी तस्वीर को धूप –बत्ती दिखाता और उसके बाद अपनी दुकान शुरु करता। इसी तरह विद्दा भारती, अमिताभ बच्चन-जैसे चर्चित अभनेता व अभिनेत्रियों को सत्कार और प्रेम मिलता रहा तो क्या ये ईश्वर हैं?? हर क्षेत्र में एक इतिहास रचयिता आता है। उस इतिहास रचने वाले को आम लोगों के जीवन में विशेष स्थान मिलता है। लोग उसे अनुकरण करते हैं, पूजते हैं अपना दिन उसके दर्शन से सुखद होता मानते हैं। वकालत में इतिहास रचयिता और उपलब्धि हासिल करने वाले को वकालत पढ़ने वैले बच्चे पूजेंगें। टीचर्स डे के दिन हम शिक्षकों को पूजते हैं। परीक्षा में जाने के पहले उनका आईशीर्वाद लेते हैं। बहुत से श्रवण कुमार कहीं न कहीं तो धरती पर होंगे जो माता पिता को पूजते होंगे। पर क्या दुनिया उस व्यक्ति के माता पिता को पूजती है??  जानती भी नहीं है। ठीक उसी तरह जिसतरह टेनिस खिलाड़ी शारापोवा का मैच देखने गये क्रिकेट के भगवान सचिन को शारापोवा नहीं जानती थीं। यहां मेरा मकसद किसी विवाद को जन्म देना नहीं बल्कि मात्र एक संयोग पेश करना था। मैं खुद भी सचिन तेंदुलकर की बड़ी या छोटी नहीं कहूंगी पर जबरदस्त फैन अवश्य हूं। सभी की तरह मेरी आंखों में भी आंसू थे जिस दिन उन्होंने क्रिकेट से संयास लिया था। कहने का तात्पर्य यह है कि हम सबमें वो परम आत्मा कहीं न कहीं विद्दमान है। जो हम सबको सांस लेने से लेकर जीना सीखाता है और सांस रुकते ही परम धाम या पंच तत्व या मिट्टी में मिल जाने का संकेत देता है। क्योंकि इस शरीर को बर्दाश्त करना लोगों के लिए असहनीय बन जाता है। वहीं मोरारी बापू, किरीट भाई जी ईश्वर के अस्तितव का बखान करते हैं पर स्वंय को कभी भी ईश्वर बताने का भ्रम नहीं पाला। संत ईश्वर और मानव के बीच मात्र माध्यम है एक ब्रिज मात्र है। ईश्वर नहीं। उन्हें आभास है कि इस नश्वर शरीर में उस परम शक्ति का कण मात्र सही पर है पर कण कण से बना वो परम जिसकी कल्पना अकल्पनीय. या बियांड एक्सपेक्टेशन है। हम मानव वो हो नही सकते। अब सवाल एक और भी उठता है-राम और कृष्ण भी तो मानव रुप में धरती पर अवतरित हुए। उन्हें ईश्वर के रुप में क्यूं पूजा जाय ?? शास्त्रों में वर्णित है कि आदिगुरु शंकराचार्य स्वयं शंकर भगवान के अवतार थे। जिन्होंने मात्र धर्म की स्थापना व्यापक रुप में करने के लिए ही इस धरती पर उस काल में पदार्पण किया था। आज लोग शंकराचार्य को साईं के तर्ज पर तो ईश्वर नहीं मानते।   
कहने का पर्याय यह है कि धर्म की नीतियां जीवन में समभाव, चरित्र की उत्तमता की ओर मानव जीवन को प्रेरित करती हैं। धर्म अवहेलना नहीं संतुलन सीखाता है। संतुलन ही यह बताता है कि समभाव रखते हुए बगुला और हंस में अंतर कैसे किया जाना चाहिए।
 






 
              क्या जैसा देश वैसा ही भेष ??

 सर्वमंगला मिश्रा
वो लोग सौभाग्यशाली होते हैं जिन्हें कोई शहर पहली बार में अपना लेता है। उन लोगों को इस वाक्य से ज़रा भी परहेज़ नहीं होगा जिन लोगों ने दूसरे शहर में जाकर अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष किया होगा। कश्मकश से भरी जिन्दगी इतनी आसान नहीं होती। कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें देखते देखते आदत पड़ जाती है और फिर आप कहते हैं हां यार, नाट बैड.....राजनीति भी एक ऐसा मंच है जहां हजारों कलाकार आते और जाते रहते हैं। कुछ दिल में बस जाते हैं, तो कुछ को देखने और सुनने की आदत पड़ जाती है। राजनीति लोगों को हमेशा दोराहे पर खड़ा कर देती है। उन्नति भी कराती है पर अवनति की सीढियां चढ़वाकर। जब आपका चारित्रिक पतन हो जाता है और आप स्वंय के लिए न जाने कितनी भावनाओं की लाशों पर चढकर अपना आशियाना खड़ा करते हैं, तो यही कहा जा सकता है कि जीवन सरल पर कठिन हो गया है।
यह राजनीति ही है जो विदेशी मूल की महिला को बाल काले करने पर मजबूर कर देती है। ममता बनर्जी जिन्होंने 34 साल के मजबूत लाल किले को गिरा डाला, पर अपनी हवाई चप्पल और सादी साड़ी का साथ नहीं। लालू यादव को उनका हेयर स्टाइल नहीं बदलने देती। तो मुलायम को दाढी नहीं बढाने देती। वहीं झारखंडी विश्वविख्यात हीरो महेन्द्र सिंह धोनी जिसका नाम ही काफी है अपनी हेयर स्टाइल बदलने के लिए फेमस है। पहले लम्बे लम्बे बाल तो 2008 में बाल छोटे कर सबको चौंका दिया। फिर वल्ड कप जीतने के बाद मन्नत के कारण सिर मुंडवा लिए.....ऐसा सौभाग्य इन नेताओं का कहां ???? वहीं भारत के पूर्व बहुचर्चित राषट्रपति डा. अब्दुल कलाम आजाद के बालों को लेकर अमूमन हर चैनल ने पब्लिक ओपिनियन ले डाला। अपने बालों के कारण उनकी चर्चा घर घर होती रही। वृंदा करात अपनी बिन्दी छोटी नहीं कर सकती तो शैलजा और प्रिया दत्त लगा नहीं सकती। सुषमा स्वराज सलवार कुर्ता नहीं कभी पहनीं तो उमा भगवा नहीं छोड़ सकतीं। पर, मायावती अपवाद हैं। पहले उनकी पोनी टेल हुआ करती थी जो अब बाय कट में परिवर्तित हो चुकी है और लगता नहीं कि अब वो अपना रुप बदलना चाहेंगी । कारण है कि अब अपनी इतनी मुर्तियां बनवा चुकी हैं कि पब्लिक में भ्रम का संचार हो जायेगा। अम्मा अपने जमाने की हिरोइन थी पर अब जिंन्स नहीं पहन पायेंगी, नेता बनने के बाद उनका लिबास सेट हो चुका है। राजनीति की चहेती हिरोइन प्रियंका वार्ड्रा गांधी अपने इन बालों के साथ इतनी फेमस हो चुकी हैं कि बाल लम्बे करने की इच्छा शायद अब सपने में ही करके संतोष करेंगी। उनकी दादी छोटे और हल्के घुंघराले बालों की मिशाल रह चुकी हैं। प्रियंका को उनकी छवि माना जाता है। राजनीति का साधु वेश वाले बाला साहब ठाकरे जी जिनके परिधान जैसा शायद ही कोई खुद को संजो कर रख सके....एक मिसाल थे। किरण बेदी जिन्हें न जाने कितने उपनाम मिले उनकी पहचान उनकी वर्दी और बाल रहे। पत्रकारिता में बरखा दत्त, प्रणव राय, पुण्य प्रसून वाजपायी, आशुतोष, दीपक चौरसिया भी अपनी वेश भूषा की वर्दियां छोड़ने में अब हिचकिचायेंगें।
पर, राजनीति में क्या वेश-भूषा ही महत्वपूर्ण है ??? क्योंकि पुराने जमाने में रजिया सुल्तान और लक्ष्मीबाई के बाल कैसे हुआ करते थे यह शायद मुझे लिखने की आवश्यकता नहीं है। यह वह समय था जब परंपरा और मान मर्यादाओं का काल था। आज आधुनिक युग में एक ऐसा नेता है हमारे बीच जिसने यह कहा था कि राजनीति करने के लिए कुर्ता पायजामा पहनना आवश्यक नहीं...जिन्स पहनकर भी राजनीति की जा सकती है। मुझे याद है एक बार सोनिया गांधी की रैली थी हम सब वही सुन रहे थे। भाषण खत्म होने के बाद सोनिया जी जब बैठीं तो अचानक हमारे एच ओ डी साहब के मुंह से निकला अरे!  सोनिया तो पूरी भारतीय हो गयी। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि सोनिया गांधी ने आंचल से अपना मुंह पोछा था गर्मी के कारण.....यानी पसीना...। राजनीति हर किसीको आकर्षित करती है पर यहां न जाने कितना पसीना और दम निकल जाता है और निकाल भी लिया जाता है। छुपी राजनीति करने में भी लोग नहीं हिचकते। जैसे वीरप्पन की मुंछे, तो किशन जी का गमछा कभी हटा नहीं। वहीं ओसामा बिन लादेन की दाढी और टोपी....पर ओसामा के बाद में कई रुप फूल्लन देवी की तरह सामने आये।  अपनी छवि बनाने के लिए ही चार्ली चैपलीन की मुंछ की साइज और शेप को बरकरार रखा गया। चार्ली चैपलीन की असल तस्वीरों में शायद ही उन्हें कोई पहचान सके। पी सी सरकार, तो भूटानी राजा अपना पारंपरिक ड्रेस पहनकर ही घूमते हैं, फारमल्स नहीं पहन सकते। आडवाणी जी की मुंछों का साइज कभी नहीं हिलता, और मोदी जी के कुर्ते का हाथ लम्बा नहीं होता.... पर बनारस में नामांकन के दिन मोदी ने फूल स्लीव का कुर्ता डाला था। राज शायद आने वाले दिनों में खुलेगा। अब हर कोई अमोल पालेकर की गोल माल पिक्चर को फालो तो नहीं कर रहा होगा।

पर, कुछ अपवाद भी हैं अटल बिहारी वाजपायी, पी वी नरसिम्हा राव, चिदंबरम, समय समय पर अपनी वेश भूषा में भी दिख जाते हैं और अंग्रेजी पहनावे में भी। यह राजनीति ही है जो इंग्लैंड की महारानी ऐलिज़ाबेथ को अपना पहनावा मिडिया और जनता के सामने आने पर अपनी पारंपरिक वेश –भूषा में ही सामने आती हैं। हर समाज की अपनी पहचान, मर्यादा और प्रतिष्ठा बनते बनते बनती है। जिसतरह मंदिर का पुजारी अपने धोती और चादर में रहता है, मौलवी अपनी वेश भूषा में तो पादरी अपनी....पर वेश भूषा से उपर है आंतरिक वेश भूषा को ठीक करना अपनी मानसिकता को हमें ऐसे वस्त्र पहनाने चाहिए जिससे समाज और देश का पहनावे का रंग आसमानी हो जाये। जिससे विश्व में एक संदेश जाये कि मन को सुंदर बनाने के लिए भारत का अनुकरण करना चाहिए जैसा संदेश मदर टेरेसा ने दिया, गौतम बुद्ध और अशोक ने दिया। मजेदार बात अब कहना चाहूंगी कि सम्पूर्ण भारतीयता के समर्थक माने और जाने जानेवाले प्रधानमंत्री जी श्री नरेंद्र मोदी जी विदेश में जाकर हिन्दी ही बोलेंगें तो परिधान भी भारतीय ही होना चाहिए। अब मोदी जी कभी हाफ सिल्व तो कभी फुल बांह के कुर्ते में भी दिख जाते हैं।
                   
                         गंगा




सर्वमंगला मिश्रा-
9717827056
देवलोक में विचरण करने वाली, ऋषियों के कमंडल में रहने वाली गंगा, अपनी एक बूंद के छिड़काव मात्र से स्थान, मन को पवित्र करने वाली गंगा, पवित्रता का सूचक गंगा आज खुद पवित्र होने की आकांक्षा लिए उस वीर सिद्ध पुत्र का शायद इंतजार कर रही थी। मोक्षदायिनी गंगा को अब शायद मोक्ष मिल जायेगा। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का यह संकल्प पूरे देश में एक जूनून का रुप ले रहा है। गंगा एक अति पवित्र और स्वर्ग से उतरी जल धारा है। जिसे कई वर्षो की तपस्या के उपरांत धरती पर लाने वाले भगीरथ जी का नाम आज भी आध्यात्म के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से अंकित है। धरती पर आने के बाद गंगा की दशा धीरे धीरे परिवर्तित होती चली गयी और आज यह दशा हो चुकी है कि गंगा की मलीनता कहीं न कहीं चरम पर मानी जा रही है। गंगा की अविरल धारा में नदी नाले सभी सिमट से गये हैं। भगवान शिव की जटा से निकली गंगा का रुप इतना कलुषित हो गया है। जिसे फेशियल की जरुरत नहीं पूल बाडी मसाज और प्रापर ट्रीटमेंट की आवश्यकता आन पड़ी है। मां गंगा को शायद भागीरथ के आमंत्रण का एहसास नहीं था कि धरती पर इतने कलुषित और पापी प्राणियों का वास है जिनके पाप धोते धोते उन्हें उबारते –उबारते खुद उन्हें स्वंयं को उबारने की आवश्यकता आन पड़ेगी। अन्यथा स्वर्ग लोक से दिव्य वस्त्र धारण कर आती सीता जी और भीष्म पीताम्मह की तरह..जो कभी कलुषित न होते। गंगा गोमुख से निकलकर पहाड़ पठार फिर नदी नाले पार करती बंगाल की खाड़ी में सम्मिलित हो जाती है। जहां महत्ता को चार चांद लग जाते हैं और प्रति वर्ष गंगासागर का मेला लगता है। जिसमें देश ही नहीं विदेशों से पर्यटक, देशी साधु संत अपनी जटा जुट लपेटे, नागा साधु भी पहुंचकर गंगा की महत्ता और पवित्रता का साक्ष्य बनते हैं। क्योंकि माता कभी कुमाता नहीं होती पुत्र भले कुपुत्र हो जाये- उसका आंचल बच्चों के लिए कभी मैला या छोटा नहीं पड़ता। उसका आंचल आसमान की तरह विकसित है उसके करुणामयी दिल की तरह। बच्चों के कष्ट को न देख पाने वाली मां गंगा अपनी अविरल धारा से सतत पापों की बेड़ी में जकड़े धरती के लोगों को मुक्ति देने में जुटी है।
श्री राम शर्मा द्वारा लिखित एक कहानी स्मृति में उन्होंने लिखा था कि- दृढ़ संकल्प से दुविधा की बेड़ियां कट जाती हैं। आज वही याद आ गया और सच भी लग रहा है। कई बार कई विदेशी रिपोर्टों में यह उल्लेख किया गया कि गंगा का जल अति प्रदूषित और संक्रामक हो चुका है। गंगा पर चिंता और चिंतन करना भारतीयों के लिए अति स्वाभाविक है पर, विदेशी संस्थाओं की चिंता और चेतावनी सदा सर्वदा अनसुनी कर दी गयी। केंद्र सरकारों ने कभी इसकी व्यापक तौर पर सुध नहीं ली।  ऐसा नहीं है कि केंद्र सरकारें मौन मूक बधिर बनी रहीं। गंगा एक्शन प्लान बना। राजीव गांधी ने गंगा के लिए सोचा प्लान बनाया पर धरातल पर सक्सेसपूल नहीं हो सका। जिम्मेदारी का एहसास हुआ पर दृढ़ संकल्प की कमी रह गयी। सरकारें हमेशा बेरोजगारी, भुखमरी और आतंकवाद के मसलों पर उलझी रही और देश को भी उलझाती रही। आतंकवाद पर बैठकों पर बैठकें हुईं, विकास के मुद्दे पर चर्चा और आलोचना हुई, बेरोजगारी के मुद्दे पर चिंता ज़ाहिर हुई भूखमरी से मरने वाले मासूम बच्चे, महिलायें और किसानों के आंकड़े कुछ बताये गये तो कुछ छुपाये गये। पर अंतोगत्वा, देश में अराजकता की धूल भरी आंधी तूफान और फिर चक्रवात में परिवर्तित हो गयी। जनता की आंखों में धूल की किरकिरी ऐसी घुसी की सरकार पर निगाहें रख पाना मुश्किल हो गया। जिससे गंगा की धारा अन्य नदियों की भांति दिन पर दिन अपना अस्तित्व खोती चली गयी और जनता अपने दुर्दशा के बांध को ठेलती ढकेलती रही ताकि जीवन की आवश्यकताओं की कमी से निज़ाद पा ले पर ऐसा हो न सका। जीवन में बेरोजगारी, भुखमरी और सरकारी तरकशों से बच न सकी। पर हर समस्या का हल होता जरुर है। उस शोधकर्ता की आंखें बस होनी चाहिए। व्यापक अंदाज़, बहुआयामी सोच और सरस भाव होने चाहिए।
आज गंगा को बचाने की मुहिम पूरे देश में एक एकता के रुप में उजागर हो रही है। गंगा कितनी लम्बी या चौड़ी है इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है। देवलोक से आयी इस देवी का मान आकाश में  चमकने वाले  सूर्य और चन्द्रमा से भी अति वन्दनीय है। गंगा में लगता है जितनी बूंदे हैं उतनी जनता अब जागरुक होकर खड़ी हो जायेगी और अति संवेदनाहीन पक्ष को एक संगठित और मर्यादित औऱ सराहनीय विश्वस्तरीय ख्याति का पुनार्जन होगा। इस परिपेक्ष्य में एक सवाल कहीं न कहीं जन्म अवश्य लेता है।मोदी जी ने एक महीने 12 दिन के अंदर कई ऐसे फैसले और घोषणायें कर दी है जो सपनों में विचरण करने से कम नहीं। गंगा सफाई अभियान, बनारस में अमूल की फैक्ट्री से हजारों की संख्या में रोजगार देकर बेरोजगारी की समस्या को कम करने की अद्भूत योजना और रेल बजट में दिया गया और टेस्टीफाइड हाई स्पीड ट्रेन की मनभावन योजना। जिसतरह मोदी जी चुनावों के दौरान रैलियों में बोले उससे यही लगता था अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज के बाद अब एक अच्छा वक्ता भाजपा ने पेश किया है। पर एक कहावत है कि जो बरसते हैं वो गरजते नहीं और जो गरजते हैं वो बरसते नहीं। इसी तरज पर मोदी जी ने हाल ही में हुए सूरजकुंड मेले में जो कैम्प लगाया और अपने सांसदों को मूलमंत्र दिया कि बेवजह विवाद से बचें, समाज के हित में कार्य करें, किसी से डरे नहीं, निष्पक्ष और निडर होकर फैसले लें। स्वयं के ऊपर अति साजो सज्जा से दूर रहने की सलाह दी। तो इस सलाह को सलाह के तौर पर नहीं बल्कि आदेश के तौर पर देखा जाना चाहिए, क्योंकि मोदी का दूसरा नाम हिटलर और डान माना जा रहा है।हर विभाग के फैसले में उनकी हामी निर्विवाद रुप से आवश्यक मानी जा रही है। क्योंकि मोदी जी कोई रिस्क नहीं लेना चाहते। पांच वर्ष का कार्यकाल पूर्ण करने में कोई त्रुटि या बाधा नहीं आने देना चाहते हैं। वैसे भी मुझे मां गंगा ने बुलाया है- यह वाक्य कि मोदी मां गंगा के सुपुत्र हैं तो मां को बेटा तकलीफ में कैसे देख सकता है। इसके अलावा वाराणसी मोदी के लिए वो यादगार पावन धरती है जिसने उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर उच्चासीन कर दिया। तो मां गंगा का कर्ज जिसकी सौगात प्रधानमंत्री होने के पूर्व ही उन्होंने अपने इस संकल्प को जगजाहिर कर दिया था। मां का हृदय तो यंही कोमल होता है। बेटे ने कहा मां गदगद हो गयी अब वक्त है प्रधानमंत्री मोदी जी अपनी बात पर खरे उतर जायें। निर्विवाद रुप से अगर मोदी जी अपने कम बोलकर ज्यादा काम को तवज्जो दे रहे हैं तो निश्चित तौर पर गुजराती माडल स्वर्णिम अक्षरों में विश्व के मानस पटल पर अंकित हो जायेगा और युगों युगों तक याद रखा जायेगा।

कहते हैं ना कि जब मूल समस्या की जड़ तक यदि आप पहुंच जाएये तो छोटी –छोटी समस्यायें पलक झपकाते हवा में कर्पूर की तरह उड़ जाती हैं। ठीक उसी तरह गंगा सफाई अभियान ने दूसरी मैली नदियों जैसे यमुना नदी पर भी लोगों का ध्यान केंद्रित हो रहा है। इसी तरह स्वच्छ जल स्त्रोत का अभाव झेल रहा भारत देश स्वच्छता की पटरी को चाक चौबंद करने में जुट गया है। पर, इसके साथ ही कई गांव, शहर और राज्य आज भी ऐसे हैं जहां पानी की किल्लत से आम जनजीवन अमर्यादित है। इस सफाई अभियान के साथ या उपरांत यदि उन सूदूर ग्रामीण इलाकों में पानी का स्त्रोत पहुंच जाय तो महिलाओं के जीवन को सम्मान व परिवारों को परेशानी से जूझना नहीं पड़ेगा। ध्यान देने योग्य बात यह है कि सरदार पटेल का विश्व का सबसे ऊंचा स्टैच्यू बन जायेगा, हाई सपीड ट्रेनें चलेंगी और गंगा की अविरल धारा सिर्फ सूरज की रौशनी में नहीं बल्कि गंगा आरती के वक्त भी चाहे वह हरिद्वार का तट हो या बनारस के घाट एक परिदृश्य दिखेगा –चमचमाती, उजली मां गंगा जिसे देखने विश्व का सबसे बड़ा समूह एवं पर्यटक जत्था आयेगा तो विदेशी मुद्रा का आगमन अधिकाधिक मात्रा में होगा जिससे चमकती जल की बूंदों के रख रखाव पर कोई कष्ट नहीं मंडरायेगा।
                 इंसानियत और राजनीति

सर्वमंगला मिश्रा
9717827056

धर्म में आस्था रखने वाला इंसान अपने दिन का शुभारम्भ उस सर्वशक्तिमान के नाम के साथ करता है। सुबह उठते ही हिन्दू पूजा करता है तो मुस्लिम नमाज़ अदा करता है, सिक्ख वाहेगुरु के सामने मत्था टेकना शुभ मानता है तो क्रिश्चियन चर्च जाकर जीसस के सामने प्रेयर करता है।पर, धर्म जब इंसानियत को पीछे छोड़ कट्टरता की ओर उन्मुख हो तब यह समझ लेना चाहिएकि खुद को सुधारने का वक्त आ गया है। कबीरदासजी जो हिन्दू और मुस्लिम दोनों माने जाते थे । साथ ही उनकी रचनायें प्रारम्भ से दोनों वर्गों तथा बाकी जातियों पर भी कुठाराघात करने से नहीं चूकते थे।
पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार,
ताते वह चक्की भली , जाको पीस खाय संसार।
कांकर पाथर जोड़ के मस्जिद लयी चुनाय
ता चढि मुल्ला बांग दे, बहिरा हुआ खुदा।
 
अयोध्या-बाबरी मस्जिद, गोधरा, मुज़फ्फरनगर और अब मुरादाबाद। धर्म के नाम पर आस्था की आड़ में जातिवाद का खेल आज तख्तो ताज के लिए खेलना राजनीति का हिस्सा बन चुका है। बहरा खुदा नहीं मानव की चेतना हो गयी है। इंसानियत बहरी हो गयी है, शायद पंगु भी। अयोध्या की कहानी इतिहास के पन्नों में ब्लैक बैकग्राउण्ड पर बलैक लेटर से लिखा जा चुका है। कितने धर्म में आस्था रखने वाले अभिभावकों को यह कहते सुना गया था कि मेरा बेटा राम की भक्ति के लिए बलिदान हुआ है। उसका जीवन धन्य हो गया। राम नाम के लिए मेरे बेटे ने अपना जीवन समर्पित किया है। ऐसे ही न जाने कितने माता पिता, बहन और परिवार वालों ने अपने सगों के लिए ऐसी मर्यादित भाषा का प्रयोग किया था। उस समय इतने न्यूज चैनल नहीं हुआ करते थे। दूरदर्शन, बीबीसी प्रमुख थे। अयोध्या काण्ड की टेपें लोगों ने उन दिनों चोरी छुपे देखी थी। कोई भी टेप को अपने घर नहीं रखना चाहता था कारण जिस व्यक्ति के घर से ऐसी कोई सामग्री बरामद होगी तो पुलिसिया कार्रवाही होगी। मुझे याद है हमने दो बार दो घरों में देखा था। आज, खुले आम टी वी चैनलों पर खुले आम कवरिंग होती है और भावना जनमानस में हिलोरे पल पल में लेने लगता है। कभी ज्वार कभी भाटा की तरह कभी सरकार के विरुद्ध बिगुल बजने लगता है तो कभी जनमानस के क्रियाकलाप पर सवालिया निशान चिन्हित होता दिखता है। आज इस बात को उठाने का मकसद यह है कि धर्म की आड़ में राजनीति कब बंद होगी?? कभी वृंदा करात यह कहने से नहीं चूकीं कि बाबा रामदेव की दवाइयों में हड्डी मिली हुई है तो कभी बीजेपी कार सेवकों का नारा था- कसम राम की खाते हैं, मंदिर यहीं बनायेंगे। साढे 23 साल बीत गये राम का मंदिर और मस्जिद में आजतक कलह का आसमान छाया हुआ है। जिस तरह भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर सालों से सांप छुछुदंर का खेल चलता आ रहा है। करोड़ों हिन्दुओं की आस्था माता वैष्णों धाम में टिकी है पर अगर केंद्र सरकार और राज्य सरकार में सहमति का बीज़ नहीं पनपा तो धारा 370 के साथ वीजा का नियम न लागू हो जाय माता वैष्णों के दर्शन के लिए। आशंकाओं से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। जीवन अनिश्चितताओं से भरा है। ख्वाजा की दरगाह मुक्त हस्त से दर्शनार्थियों का स्वागत करता है जहां पाक के नामचीन हस्तियां भी आयीं दरगाह पर मत्था टेकने..चादर चढाने। पर, मुरादाबाद में लाउडस्पीकर लगाने और न लगाने के मामले ने ऐसा तूल पकड़ा कि महापंचायत बुलानी पड़ी। महापंचायत में पथराव और दंगे के चलते डी एम को अपनी बांयीं आंख की रौशनी से हाथ धोना पड़ गया। क्या सहिष्णुता ने इस संसार से सन्यास ले लिया है? धीरज अपनी कर्मनिष्ठा से मुंह मोड़ चुका है? शांति सीताजी की तरह भूगर्भ में जा चुकी है? प्रेरणा स्त्रोत जीवन और व्यक्तियों का अकाल पड़ चुका है? असहजता, अशांति और  अराजकता ही राज्य करेंगे?
दंगा चाहे गोधरा का हो या मुजफ्फरनगर का इससे राजनीतिज्ञों के अलावा किसी का भला नहीं हुआ। आज भी मुज़फ्फरनगर के दंगा पीड़ित किस दहशत के साये और खुले आसमान के नीचे, बदतर हालात में जीने को मजबूर हैं। यह बयां नहीं किया जा सकता। बेसहारा हुए वो परिवार आज दहशत की लाश बनकर जी रहे हैं। राज्य सरकार घोषणा जरुर करती रहती है कि हमने फलां फलां चीज़ें उपलब्ध करायीं पर, धर्म की आड़ में फैलायी गयी आग में झुलसे उन परिवारों से कोई तो उनकी दासतां, दरदे हाल कैमरा बंद करके पूछो। सभी तो इंसा है खून तो लाल ही है फिर मज़हब को खून का रंग देने पर क्यों तूले हैं। इसका तात्पर्य क्या अब जनमानस को यह समझना चाहिए कि पंचायतें और महापंचायत अस्तित्वविहीन हो चुकी हैं। महापंचायत मात्र नाम के लिए या दबंगों की राजनीति का हिस्सा या उनके हाथों की कठपुतली मात्र रह गयी हैं। तो बापू ने जो सपना देखा था पंचायतों के निर्माण और कानून व्यवस्था बनाये रखने का उत्तम माध्यम हो बेबुनियाद था या अब बन गया है। जिस पंचायत और महापंचायत पर गांव और गांवों के समूह का दायित्व रहता है वो कंधे अब चोटिल हो चुके हैं या बूढे और आदर्शविहीन ? जिससे पंचायत का मुख मलीन पर दिन मलीन होता चला जा रहा है।
धर्म की आड़ में राजनीति की लड़ाई ने इंसानियत को बेजुबां कर दिया है। कोलकाता के टीमसी के एक नेता ने यह कहकर कि यदि किसी सीपीएम के कार्यकर्ता ने उनके कार्यकर्ता या उनके परिवार वालों पर जरा सी भी आंच आयी तो वो दहशत का ऐसा पाठ अपने लोगों के जरिये सीखा देंगें। शब्द लिखे तो नहीं जा सकते परन्तु अमर्यादित अतिसंकीर्ण और विचित्र मानसिकता राजनीति में कदम रख चुकी है। ऐसी मानसिकता को जल्द काबू में नहीं किया गया या इन बदजुबानों को कड़ा सबक नहीं सिखाया गया या ऐसा कोई कानून लागू न किया गया कि फ्रीडम आफ स्पीच एंड इक्स्प्रेशन का गल्त इस्तेमाल न हो इसके लिए समाज को खुद सुधरना होगा और सरकारों को कड़े नियम इख्तियार करने होंगें। आजकल टी वी पर संसद का सत्र हो, या विधानसभा का लगता है जैसे यह देश की वरिष्ठ गवर्निंग बाडी नहीं बल्कि गांव के नुक्कड़ पर आये कुछ अति समझदार नौटंकी वालों की टोली हो जिसे सिर्फ तमाशा दिखाना है और चर्चा का हिस्सा बनना है।जिसे नाटक के ओर अंत से कोई वास्ता नहीं। जिसकी समझ कुएं के मेंढ़क की तरह सीमित हो। कुछ नौटंकी वालों की फहरिस्त बढ़ती जा रही है और इसमें वो अच्छे फूल मुर्झा रहे हैं। सांसद अब प्रश्न पूछते हैं तो लगता है मकसदमात्र सदन में बोलना है। मीडिया अट्रैक्शन लेना आजकल नेताओं का पहला मकसद हो गया है।
इंसानियत को जिंदा रखना हम इंसानों का ही परम एवं सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य होना चाहिए। ताकि आने वाली पीढियां गर्व के साथ खुद को भारतीय परंपरा का हिस्सा कहने से संकोच न करें.
  

  मिस्टिरियस मुम्बई  में-  सुशांत का अशांत रहस्य सर्वमंगला मिश्रा मुम्बई महानगरी मायानगरी, जहां चीजें हवा की परत की तरह बदलती हैं। सुशां...