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Saturday, 30 November 2019


आकाश कैसे बंध गया?

सर्वमंगला मिश्रा 


उद्धव का उद्भव आखिरकार हो ही गया।  जिस ठाकरे परिवार के आगे आज भी जनता झुकती है उद्धव ठाकरे ने शपथ समारोह में शपथ लेने के बाद मंच पर सिर झुकाकर जनता को नमन किया। इस विश्वास के साथ कि आज भी महाराष्ट्र की जनता उद्धव और शिवसेना को उसी तरह देखती है, जिसतरह वो बालासाहेब को देखती थी। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार तिकड़ी में बन तो गई है और साथ ही एक इतिहास भी रच चुकी है। देवेन्द्र फड़नवीस का इस्तीफा देना अपने आप में पर्दे के पीछे की रहस्यमयी कहानी है। अमित शाह का वचन अब झूठा साबित हो गया। महाराष्ट्र चुनाव के पहले से शाह ने मुख्यमंत्री के तौर पर देवेन्द्र को ही देखा था। कारण यह था कि महाराष्ट्र की सरकारों में आजतक कितना उलटफेर हो चुका है इतिहास इसका गवाह है। भाजपा की छत्रछाया में देवेंद्र फड़नवीस ने पांच साल का कार्यकाल बखूबी पूरा किया। एक स्थिर सरकार राज्य को दी। राज्य में विकास का आंकाड़ा कहां तक पहुंचा इसकी विवेचना एक लम्बी बहस का मुद्दा है। राजनैतिक विवेचनाकार इस बात की अलग अलग तरीके से आलोचना या प्रशंसा करेंगे। पर बात यहां ठाकरे परिवार की है जो बिना ताज बादशाह अब ताज पहन के सीमाओं में घिर गया है। जाहिर है जहां सीमा और गठबंधन होगा वहां समस्याएं भी आंतरिक रुप से होंगी।

बालासाहेब ठाकरे जिसने एकछत्र अखंड राज किया जो सभी सीमाओं से ऊपर उठकर हिन्दुओं की रक्षा हेतु सामने आए और विकल्परिहत समाज के सामने एक विकल्प के रुप में उभरे। 1966 में शिवसेना की स्थापना की। राजनैतिक पद की लालसा तब भी शायद कहीं मन में उठी थी तभी कांग्रेस के साथ सामने आए थे बालासाहेब ठाकरे। पर, कांग्रेस की फितरत कहें या राजनैतिक दावपेंच बालासाहेब भी धोखा खाए और अपनी पार्टी का अस्तित्व स्वयं खड़ा किया। सम्पूर्ण महाराष्ट्र में बालासाहेब ने निरंकुश शासन किया बिना किसी पद की गरिमा को स्वंय या अपनी पार्टी पर लपेटे हुए। देखा जाए तो उद्धव ठाकरे भी अपने पिता के प्रभाव से वंचित नहीं रह पाए और राजनीति में शांति से प्रवेश कर पिता का अनुसरण करने लगे। पार्टी को दिशा देने का काम उन्होंने बालासाहेब ठाकरे से ही सीखा। उद्धव के चचरे भाई राज ठाकरे कुछ आक्रामक नीतियों का अनुसरण करने में यकीन रखते थे। मीडिया राज ठाकरे को ज्यादा तवज्जो देती थी। जनता को भी राज ठाकरे बालासाहेब के उत्तराधिकारी के रुप में दिखते थे। उद्धव ठाकरे ने इन बातों का कभी खंडन नहीं किया। जो भी समस्याएं रही वो आंतरिक रुप से ही रहीं। यह सत्य है कि बालासाहेब ठाकरे ने अपने पोते आदित्य ठाकरे को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था क्योंकि बालासाहेब को अपनी झलक अपने बड़े पोते में झलकती रही होगी।

साल 2019, जब महाराष्ट्र के बेताज बादशाह के परिवार ने मैदान में आम नेता की भांति घर घर जाकर वोट मांगने का निर्णय किया। अर्थात् चुनावी मैदान में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की आवश्यकता ठाकरे परिवार को महसूस हो ही गई। आदित्य भी नए दांव पेंच सीखने में जुट गए हैं। आखिर उद्धव ठाकरे की अगली पीढ़ी हैं जो शिवसेना को दिशा देने के लिए तैयार हो रहे हैं। युवा नेता को अपने पिता से ना सिर्फ राजनैतिक लूड़ो खेलने की शिक्षा प्राप्त होगी वरन कहां पहुंचकर सीढ़ी मिलेगी ये भी भलीभांति सीख जाएंगे। उनके पिता ने उन्हें विधानसभा के चुनाव में मुख्यमंत्री के पद के दावेदार के रुप में उतारा था बल्कि एनसीपी और कांग्रेस के साथ समझौते के दौरान एक बार उन्होंने अपनी नामंजुरी जाहिर की। जिससे यह तो स्पष्ट झलक रहा था कि वो स्वंय बालासाहेब की कुर्सी पर रहकर बेटे के हाथ सत्ता देकर दोहरी राजनीति कर सकते थे। लेकिन आदित्य राजनीति में एक हरे पौधे के समान हैं जिन्हें विरासत में राजनैतिक माहौल तो मिला है पर स्वंय को परखना और उन पायदानों पर चलने की कूबत स्वयं हासिल करनी होगी। जाहिर है कि दिग्गजों के सामने आदित्य बच्चे हैं और एनसीपी जिसमें शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले और कांग्रेस के अशोक चौहाण जैसे लोग इस बात को मानने से साफ इंकार की हरी झंड़ी दिखाई जिससे सत्ता और विरासत को अमिट कलंक से बचाने के लिए उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री का पद स्वीकार किया।

भविष्य के बादल में क्या छिपा है इसको भांपते हुए उद्धव ने सेक्यूलर और हिन्दुत्व सबको ताख पर रखना ही उचित समझा। यह बात अलग है कि उद्धव और राज के मन में मुख्यमंत्री के पद को पाने की लालसा और होड़ दोनों मच चुकी थी। पर व्यक्ति अपने पुत्र में अपना आज देखता है वही उद्धव भी करना चाहते थे। महाराष्ट्र का मराठी मानुष ठाकरे परिवार के आगे सालों से सिर झुकाता आया है। इस पल का साक्षी पूरा महाराष्ट्र हो जाता कि सत्ता हाथ से निकल गई। जिससे वर्षों की बालासाहेब की तपस्या मिट्टी में मिल जाती और इसी तपस्या को बचाने के लिए उद्धव ठाकरे बंधन में आ गए। इन बंधनों की पकड़ सिर्फ बाहर से ही मजबूत रहेगी या आंतरिक तौर पर भी हो पाएगी। इसके लिए शतरंज की अगली चाल का इंतजार करना ही होगा।





Tuesday, 26 November 2019

Monday, 25 November 2019


दिल्ली का अगला मुख्यमंत्री – मनोज तिवारी
सर्वमंगला मिश्रा

कहते हैं भारत का दिल दिल्ली है पर दिल्ली के दिल में क्या छिपा रहता है ये शायद ही कोई भांप पाता है। दिल्ली सदियों से शासकों का सपना रही है। महाभारत का काल हो या मुगल सल्तनत का या आज का शासन खुद नजरें घुमाकर देख लीजिए दिल्ली ही शासकों को ताज पहनाती आई है। इसी तख्तो ताज के लिए सिंहासन लाल हुए तो इक्कसवीं सदी में पोस्टर वार से राजनीति की आंखें अब डिजिटल वार पर टिक गई हैं। अब भी शासकों का दिल दिल्ली की आबो हवा में बसता है। इसी तरह 2014 का लोकसभा चुनाव में एक सशक्त सरकार देने वाले और उसकी पुनरावृत्ति भी करने वाले प्रधानमंत्री मोदी के हाथ से जब दिल्ली की सल्तनत फिसली कर केजरीवाल के हाथों गई थी तो मन में कुछ कसक रह गई थी। मोदी जी ने अपना कर्तव्य तो पूरा किया था केजरीवाल जी को बधाई देकर पर दिल्ली के शासन का न होना एक कसक जरुर बनी रही। शायद अब मोदी जी पूरे देश में भाजपा का परचम फहराने के बाद दिल्ली के फिसलने का रिस्क नहीं लेना चाहते। वैसे भी इंसान से गलती एक बार होती है। यदि दुहरा दी जाय तो यही समझा जाता है कि पहली गलती से सीख नहीं ली गई।
वैसे देखा जाये तो दिल्ली में महानुभावों की कमी नहीं है। दिग्गजों की भरमार है। पर मेरे दिमाग में एक नाम कई महीनों से कौंध रहा है। वो नाम है मनोज तिवारी। आज की तारीख में नाम ही काफी है। गायकी और अभिनय के बल पर भोजपुरी सिनेमा के जरिए लोगों के दिलों पर लम्बे समय तक राज करने के बाद मनोज जी का अमूमन हृदय परिवर्तन हुआ और 2009 में आदित्यनाथ योगी के विपरीत खड़े होने का साहस दिखाने वाला ये शक्स और कोई नहीं आज के दिल्ली के भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ही हैं। पर उस समय मुलायम सिंह की लाल टोपी वाली पार्टी से उम्मीदवार बने थे। गायकी का अपना भोला अंदाज रखने वाले और अभिनय में लगातार नम्बर वन के पायदान पर खड़े रहने वाले मनोज तिवारी ने ससुरा बड़ा पैसावाला और दरोगाबाबू आई लभ यू जैसी फिल्में की। इन फिल्मों ने मानो एक नई दिशा का आगाज़ करवा दिया। वहीं दिल्ली में पूरे देश से आए लोग बसते हैं उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम के अलावा देश विदेश के छात्र छात्राएं, काम करने वाले लोग, वहीं बस जाने वाले लोग। उत्तर प्रदेश और बिहार दिल्ली से बहुत प्रभावित रहता है। गतिविधियां प्राय:  समान सी चलती हैं। हवा का रुख दिल्ली से बहना शुरु होता है और उत्तर प्रदेश और बिहार को घेर लेता है। 
कहने का अभिप्राय यह है कि मनोज तिवारी भोजपुरी सिनेमा के दमदार नायक होने के कारण उत्तर प्रदेश और बिहार के राज्यों पर पूरी पकड़ होने के कारण भाजपा ने उन्हें पहले शामिल किया पार्टी में और फिर मोदी रुख हवा और अपनी माटी से अनंत प्रेम करने वाला भोजपुरी समाज ने जी भर के वोट दिया और दिल्ली में मनोज तिवारी जी की जय जयकार हो गई 2014 में वो भी आप प्रत्याशी के विरुद्ध 1,44,084 वोटों से। वहीं 2019 के चुनाव में कांग्रेस की भूतपूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को 3.66 लाख मतों से पराजित करने के बाद मनोज तिवारी का कद और भी ऊंचा हो गया। तो मोदी सरकार भी क्यों ना उन पर विश्वास करे जो दो बार दिल्ली की जनता के दिल में आसानी से बैठ गया। इन बातों को ध्यान में रखकर ये विश्वास किया जा सकता है और मोदी शाह की रणनीति यही होगी कि जीत गए तो दिल्ली का सिंहासन पर भाजपा के बीच मनोज तिवारी ही सुशोभित होंगे।

अब बात करते हैं दिल्ली के उत्तर पूर्व इलाके के वोटधारकों के बारे में। उन्हें मनोज तिवारी तो जीतने के बाद भी शायद कुछ न दे पाए हों क्योंकि केजरीवाल की सरकार बन गई तो ठिकरा फोड़ने के लिए एक सिर और कंधा तो अभी है। वहीं मनोज तिवारी के पास उत्तर प्रदेश और बिहार का दिल है जो दिल्ली में रहकर एक बार वो भुना चुके हैं जिससे पार्टी को भी फायदा पहुंचा और अब 2019 का साल जाने को है एक माह शेष है जिसमें मनोज तिवारी ने हौले हौले अपनी चाल और तेज कर ली है। अब अपने भोजपुरिया समाज के दिल को जीतना उनके लिए शायद ज्यादा कठिन नहीं होगा। अब भाजपा सरकार के दमदार काम लोगों के सामने हैं जैसे – तीन तलाक से मुस्लिम महिलाओं को आजादी, कश्मीर को धारा 370 से आजादी, उरी अटैक, पाकिस्तान को विश्व के समक्ष नतमस्तक कर देना और करवा देना जैसी और भी कई उपलब्धियां हैं जिन्हें दिल्लीवासी जरुरी समझते हैं। उन्हें लगता है कि गुजरात का प्रधानमंत्री होकर जब हर राज्य और हर वर्ग के लिए कुछ नहीं बहुत कुछ सोच रहा है तो ये तो अपनी माटी से जुड़े हैं अपने हैं अपना भी भला ही होगा। अपने बड़े बड़े घर छोड़कर फुटपाथ और झोपड़ पट्टियों में रहने को मजबूर ये तबका अपनी दरियादिली अपने चहेते नायक और गायक के प्रति दिखा भी दे तो क्या मनोज तिवारी भी उसका प्रतिउत्तर दे पाएंगे, महसूस कर पाएंगें उनकी तकलीफों को उनकी मांगों को असलीयत में।

मनोज तिवारी पर राजनीति हावी है। जनता का मन उन्हें मोहना आता है। इसीलिए केजरीवाल को प्रदूषण की समस्या हो या पेय जल टेस्ट में दिल्ली का 20 वें पायदान के पार खड़ा होना- हर मुद्दे पर सावधान खड़े हैं सतर्क होकर विरोध करने का एक भी मौका चूके बिना दिल्ली की कुर्सी हासिल करने की होड़ में शायद वो अकेले राजकुमार हैं।

जाने वाले जरा होशियार यहां के हम हैं राजकुमार

सर्वमंगला मिश्रा



ये गाना इसलिए याद आ गया क्योंकि महाराष्ट्र की राजनीति के छुपे रण में कुछ ऐसा ही नजर आ रहा है। जब खबर आई कि ठाकरे परिवार का पहला शक्स चुनाव लड़ने जा रहा है यानी जनता के बीच जा रहा है उनसे उनकी अनुमति लेकर सिंहासन पर काबिज़ होने के लिए तो सुनकर बहुत खुशी हुई थी कि अब महाराष्ट्र में वर्षों से अपना वर्चस्व कायम कर लेने के बाद भी जनता के आदर और सम्मान का ध्यान रखा जा रहा है भले ही ये एक औपचारिकता मात्र हो। लोकतंत्र को शिरोधार्य करने वाले छत्रपति शिवाजी को मानने वाले, बालासाहब जैसे शेर की संतान आज लोकतंत्र का मान रखकर भारत के संविधान की मर्यादा का सम्मान कर देश को मराठा जाति को गौरवान्वित कर रहा है।
पर अफसोस, बंद कमरे में बालासाहब ठाकरे के कमरे में भाजपा और शिवसेना के बीच क्या सिद्धांत तय हुए थे जिसके सहारे महाराष्ट्र के रण में पार्टियां आईं और जमकर अपना कद मापा। उम्मीद के मुताबिक ही अमूमन परिणाम आए पर शायद शिवसेना ने जितने की आस की थी उसमें कुछ कमी रह गई और भाजपा- 105 तो शिवसेना -54। पर एक बात तो शुरु से शिवसेना की ओर से तय दिख रही थी कि वो अपने सुपुत्र आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री के पद पर आसीन करवाना चाहते हैं। इसी कारण उन्होंने आदित्य को जंग के मैदान में उतारा और जीत ने भी आदित्य के कदम चूमे। यहां सवाल किसी मुकाबले के लिए नहीं लड़ा गया या कोई भी चुनाव मुकाबला तो होता है पर काबिलियत और उसका प्रोफाइल ही अहम होता है। यहां जहां देवेंद्र फड़नवीस पांच साल की सफल सरकार दे चुके है। भले ही महाराष्ट्र की समस्याएं जस की तस हों पर सुदृढ़ता रही है। वहीं आदिच्य की बात करें तो राजनीतिक सशक्त परिवार से तो आते हैं पर राजनीति के प्रति उनका मोह या उनकी असलीयत में कितनी रुचि है जनता शायद इससे वाकिफ नहीं है। 29 वर्षीय आदित्य को बचपन से बालासाहब ठाकरे का प्रेम और आशीर्वाद मिलता आया है और वो आदित्य को ही उत्तराधिकारी मानते थे और कई बार उन्होंने अपने कई साक्षात्कार में इसे स्पष्ट भी किया था। लेकिन इसका अर्थ ये कतई नहीं लगाया जा सकता कि आदित्य राजनीति के प्रपंची खेल के लिए परिपक्व हैं। इसके इतर शरद पवार भी अपनी सुपुत्री सुप्रिया सुले के लिए दांव पर दांव खेल रहे हैं।


यदि आदित्य ठाकरे महाराष्ट्र की गद्दी पर काबिज़ भी हो जाते हैं येन केन प्रकारेण तो क्या होगा- सिंहासन के पीछे की राजनीति शुरु हो जाएगी। क्योंकि आदित्य अभी कुमार हैं उगते हुए सूर्य की तरह मध्यान्ह का सूर्य बनने के लिए वक्त चाहिए होगा। अभी राजनीति और जनता के प्रति उत्तरदायित्व को समझने के लिए उन्हें और वक्त के साथ परिपक्व होना होगा। अभी राजनीतिक स्तर के फैसले लेने की दक्षता अभी अकल्पनीय है। सौराष्ट्र की जनता का हित अहित कहां निहित है इसे उन्हें समझना होगा तब होंगें सूर्य की तरह देदिप्यमान और समर्थन प्रकाश की किरणों की तरह उनका स्वागत करेगी। लेकिन सूर्य को पहले उगने तो दीजिए।  जिसतरह संजय राउत अभी अपना बड़बोलापन दिखा रहे हैं उसी प्रकार सारे फैसले कौन लेगा उद्धव ठाकरे, संजय राउत या और कोई। जैसे उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार रही पिछले कुछ सालों में योगी जी के पहले पता नहीं चलता था कि अखिलेश की सरकार है या मुलायम की या आज़म खान की। ठीक वही स्थिति यहां भी नजर आ रही है।

एकतरह से देखें तो शिवसेना की हिंदूवादी राजनीति की पृष्ठभूमि खिसकती नजर आ रही है। जिस शिवसेना का जन्म 1966 में हुआ उसने भी बालासाहब ठाकरे के नेतृत्व में कांग्रेस से धोखा खाया था तबसे उससे किनारा ही कर लिया और भाजपा के साथ कदमताल करने लगी। पर, पूरे भारत ने देखा और आमची मुम्बई ने समझा कि सत्ता के आगे हथियारी हाथ हार जाता है। यूं तो सर्वविदित है कि जमीनी स्तर पर महाराष्ट्र और उसके आस पास के इलाकों में भी शिवसेना का वर्चस्व इस तरह कायम है जिस तरह बन्दूक और गोली का रिश्ता, सूर्य और प्रकाश का रिश्ता, जमीन और उससे लगे पेड़ों की जड़ों का रिश्ता। ऐसे में अगर शिवसेना चुनाव में उतरकर भी सत्ता हासिल नहीं कर पाती है तो शिवसेना का अस्तित्व प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रुप से सूर्य के अस्त होने का संकेत दे सकता है। वैसे आदित्य ठाकरे के पास अभी काफी वक्त है राजनीति की धुरी पर अपना सिक्का आजमाने और जमाने को।

अमान्य सरकार शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के मुताबिक जो देवेंद्र फड़नवीस और अजीत पवार ने बनाई है। उसके बनने से शिवसेना का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा। उधर अमित शाह ने महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों से पहले अपने सभी साक्षात्कार में एक ही बात दुहराई थी कि महाराष्ट्र के सी एम देवेन्द्र फड़नवीस ही होंगें। उसके इतर चुनाव से पहले हरबार शिवसेना और भाजपा के बीच मान मनौउव्वल होता है पर इस बार संख्या ने जरा कदम खींच लिए और दोनों पार्टियां तैश में आ गईं। सबको अपनी शर्त पर सत्ता चाहिए। जिसने जो कहा वही होना चाहिए। इस बीच जनता का अधिकार और उसकी मान्यता नगण्य सी लग रही है।

Monday, 24 September 2018


सेबी ने डेब्ट म्यूचल फंड्स को किया और बेहतर


सर्वमंगला मिश्रा
सेबी ने भारतीय निवेशकों के हित की सोचते हुए म्यूचल फंड्स की स्कीम में सुधार की प्रक्रिया लागू कर दी है। बाजार में पुराने नए निवेशकों के साथ-साथ डेब्ट म्चुअल फंड्स की योजनाएं भी काफी उलझी हुई सी प्रतीत होती थीं जिससे निवेशक भ्रामक स्थिति में रहता था और निवेश करने से हिचकिचाहट का अनुभव करता था अथवा उसे रिस्क फैक्टर का ज्ञान सही मायनों में नहीं हो पाता था। ऐसी ही उलझनों से निवेशकों को स्पष्टता प्रदान करने की दिशा में सेबी ने डेब्ट म्यूचुअल फंड्स की योजनाओं को 16 भागों में बांट दिया है। जिससे यह तय करना आसान हो जायेगा कि निवेशक कहां निवेश करे और कितनी अवधि के लिए। पहले एक ही योजना के तहत दो अथवा उससे ज्यादा योजनाएं सामान्य अंतर से लागू रहती थीं पर अब एक योजना के तहत एक ही योजना को प्रतिपादित किया गया है। कंपनियां सेबी के आदेश के उपरांत योजनाओं की जांच करके उनमें सुधार की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है। सेबी के इस आदेश से बाजार में एक नया स्तर बनेगा और बाजार एक नये रुप में दिखेगा। इससे निवेशक अपने आप आकर्षित होंगे और डेब्ट म्यूचुअल फंड्स के तहत पूंजी निवेश करने वालों की संख्या में अनुमानत:  भारी वृद्धि होगी। जिससे आने वाले समय में डेब्ट म्यूचुअल फंड्स का मार्केट एक नये आसमान को छू सकेगा।
ओवरनाइट फंड- सबसे कम अवधि के लिए या एक दिन से लेकर एक सप्ताह जैसी अवधि तक के लिए भी निवेशक निवेश कर सकता है। जिसमें अमूमन कोई रिस्क नहीं रहेगा।
लिक्विड फंड- छोटे निवेशक जिनके निवेश की अवधि 3 महीने तक या उसके आस पास की होती है इसमें निवेश कर सकते हैं। इस योजना के तहत निवेशक की पूंजी काल मनी, ट्रेजरी बिल अथवा सरकारी प्रतिभूतियों के तहत निवेश होता है। जहां से निवेशक आसानी से अपने पैसे निकाल सकता है।
अल्ट्रा शार्ट ड्यूरेशन फंड- इस योजना के तहत निवेशक 3 से 6 महीने तक के लिए निवेश कर सकता है।
लो ड्यूरेशन फंड- इस योजना के तहत निवेशक अपनी सुविधा से 6 महीने से लेकर 12 महीने तक के लिए अपनी पूंजी का निवेश कर सकता है।
मनी मार्केट फंड- यह योजना निवेशकों को एक वर्ष की अविधि तक के लिए निवेश करने की होगी जिसमें मैच्योरिटी की अवधि भी शामिल होगी।
शार्ट ड्यूरेशन फंड- इस योजना के अंतर्गत ऐसे निवेशक आयेंगे जो अपनी पूंजी को कुछ वर्षों के लिए निवेश करना चाहते हैं।इसमें एक वर्ष से लेकर 3 वर्ष की अवधि तक के लिए निवेश किया जा सकेगा। जिसमें सामान्य रिस्क रहता है।
मीडियम ड्यूरेशन फंड- इस योजना के तहत निवेशक 3 से 4 वर्ष की अवधि तक के लिए निवेश कर सकेगें।
मीडियम टू लांग ड्यूरेशन फंड- इस योजना के तहत इच्छुक निवेशक जो लंबी पारी खेलना चाहते हैं वो इस योजना में निवेश कर सकते हैं। इसकी अवधि 4 वर्ष से 7 वर्ष तक की सीमा तय की गयी है।
लांग ड्यूरेशन फंड- इस योजना के अंतर्गत सामान्य से मध्यम बड़े निवेशक प्रवेश कर सकेंगे। इस योजना के तहत 7 वर्ष से अधिक तक की योजनाओं में निवेश किया जा सकेगा।
डायनामिक बांड- निवेशको स्वेच्छा से अपने निवेश की अवधि निर्धारित कर सकता है। निवेशक को ध्यान रखना होगा कि रिस्क की सीमा भी वह स्वयं निर्धारित करे।
कारपोरेट बांड फंड- कारपोरेट बांड फंड कम रिस्क फैक्टर के साथ अच्छा रिटर्न भी देते हैं। बड़ी एवं नामी कंपनियों की निवेश योजनाओं में निवेश करना निवेशक के लिए लाभप्रद होता है। कंपनियां अपने ब्रांड की शाख को ध्यान में रखते हुए काम करती है।पहले कारपोरेट बांड फंड और क्रेडिट अपरच्यूनिटी फंड में साधारण निवेशक भ्रमित हो जाता था और कई बार निवेशक की पैसा कार्पोरेट बांड फंड की जगह क्रेडिट अपरच्यूनिटी फंड में इस्तेमाल होता था।
क्रेडिट रिस्क फंड- इस योजना में 65 फीसदी निवेशक की पूंजी उच्चतम कार्पोरेट बांड से निचले स्तरों में की जाती है।
बैंकिंग एंड पीएसयू फंड- इस योजना के तहत मुख्यत: 80 प्रतिशत बैंकिंग, वित्तीय संस्थाएं एवं सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में धन का निवेश किया जाता है।
गिल्ट फंड- इस योजना के तहत धन का निवेश प्रधानरुप से सरकारी प्रतिभूतियों में निवेशकों का धन निवेश होता है। कुल राशि का कम से कम 80 प्रतिशत धन इन योजनाओ में निवेश होना चाहिए।सरकारी संस्थाओं में निवेश करना सुरक्षा की गारंटी माना जाता है।
गिल्ट फंड विथ 10 ईयर कांस्टेंट ड्यूरेशन- सरकारी सुरक्षा योजनाओं में निवेशकों का धन निवेश होता है। इसके परिपक्वता की अवधि 10 वर्ष तक की एक समान रहती है। जिससे परिपक्वता के उपरांत निवेशक को अच्छा मुनाफा होता है साथ ही रिस्क भी बहुत कम होता है।
फ्लोटर फंड- इस योजना के तहत निवेशक का धन ऐसी जगह लगाया जाता है जहां दर अस्थायी रहता है। इसमें रिस्क अधिक रहता है। यदि बाजार मुनाफा की ओर चढ़ता है तो परिपक्वता के समय लाभ में रहता है। इसके दूसरी ओर बाजार यदि गिरावट में होता है तो निवेशक को नुकसान भी उठाना पड़ जाता है।





राफेल एक घोटाला या डील?


सर्वमंगला मिश्रा
किसी भी शासनकाल में देशहित से उपर कोई सरकार या नीति नहीं हो सकती है। देश की सुरक्षा सर्वोपरि होती है। यह आम बात है कि जब भी किसी देश में रक्षा मसौदों पर कोई डील होती है सरकार और विपक्ष में ठन जाती है अथवा मुद्दे को जानबूझकर तूल दे दिया जाता है। भारत में विशेषरुप से देखा गया है कि आजतक जितने भी रक्षा संबंधी समझौते हुए हैं विवादों के घेरे में रहे हैं और घोटाले के रुप में सामने आये हैं।
2019 का साल चुनावी साल है। जिसकी तैयारी प्रत्येक पार्टी करना प्रारंभ कर चुकी है। कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी इस मौके को पूरे तरीके से भुना लेना चाहते हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के शीर्ष नेता राफेल के रण में अपने अपने तीर कमान लेकर उतर चुके हैं। राहुल गांधी जहां संसद से लेकर सड़क तक इस मामले को पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं वहीं भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्ता संबित पात्रा कांग्रेस पार्टी का कच्चा चिट्ठा खोलने में कोई कसर नहीं रख रहें हैं। अरण जेटली समेत कई नेता युद्ध करने को मुस्तैद दिख रहे हैं तो कांग्रेस भी इस मुद्दे पर अड़ी खड़ी है।
भारत जहां चीन और पाकिस्तान से भौगोलिक रुप से घिरा है वहीं इन दोनों देशों से युद्ध की परिस्थितियां बीच- बीच में उभरती रहती हैं। इतिहास गवाह है कि भारत पाक और भारत चीन के साथ लड़ाइयां हो चुकी हैं। कौन भूल सकता है 1962, 1971 और 1999 का साल। आतकाल परिस्थितियों से जूझने के लिए और देश को आंतरिक रुप से सुदृढ़ करने के लिए वायु सेना को अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए कम से कम 42 लडा़कू स्क्वाड्रंस की जरूरत थी, लेकिन उसकी वास्तविक क्षमता घटकर महज 34 स्क्वाड्रंस रह गई। इसलिए वायुसेना की मांग आने के बाद 126 लड़ाकू विमान खरीदने का सबसे पहले प्रस्ताव अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने रखा था। लेकिन इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया कांग्रेस सरकार ने। रक्षा खरीद परिषद, जिसके मुखिया तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटोनी थे, ने 126 एयरक्राफ्ट की खरीद को अगस्‍त 2007 में मंजूरी दी थी। यहां से ही बोली लगने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके बाद आखिरकार 126 विमानों की खरीद का आरएफपी जारी किया गया। राफेल की सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये 3 हजार 800 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है।

यह समझौता उस मीडियम मल्‍टी-रोल कॉम्‍बेट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसे रक्षा मंत्रालय की ओर से इंडियन एयरफोर्स लाइट कॉम्‍बेट एयरक्राफ्ट और सुखोई के बीच मौजूद अंतर को खत्‍म करने के मकसद से शुरू किया था। एमएमआरसीए के कॉम्पिटीशन में अमेरिका के बोइंग एफ/ए-18ई/एफ सुपर हॉरनेट, फ्रांस का डसॉल्‍ट राफेल, ब्रिटेन का यूरोफाइटर, अमेरिका का लॉकहीड मार्टिन एफ-16 फाल्‍कन, रूस का मिखोयान मिग-35 और स्वीडन के साब जैस 39 ग्रिपेन जैसे एयरक्राफ्ट शामिल थे। छह फाइटर जेट्स के बीच राफेल को इसलिए चुना गया क्योंकि राफेल की कीमत बाकी जेट्स की तुलना में काफी कम थी। इसके अलावा इसका रख-रखाव भी काफी सस्‍ता था।
भारतीय वायुसेना ने कई विमानों के तकनीकी परीक्षण और मूल्यांकन किए और 2011 में यह घोषणा की कि राफेल और यूरोफाइटर टाइफून उसके मानदंड पर खरे उतरे हैं। 2012 में राफेल को एल-1 बिडर घोषित किया गया और इसकी निर्माता कंपनी दसाल्ट ए‍विएशन के साथ कॉन्ट्रैक्ट पर बातचीत शुरू हुई लेकिन आरएफपी अनुपालन और लागत संबंधी कई मसलों की वजह से साल 2014 तक यह बातचीत अधूरी ही रह गयी। यूपीए सरकार के दौरान इस पर समझौता नहीं हो पाया था क्योंकि खासकर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के मामले में दोनों पक्षों में गतिरोध उत्पन्न हो गया था। दसाल्ट एविएशन भारत में बनने वाले 108 विमानों की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थी। दसाल्ट का कहना था कि भारत में विमानों के उत्पादन के लिए 3 करोड़ मानव घंटों की जरूरत होगी, लेकिन एचएएल ने इसके तीन गुना ज्यादा मानव घंटों की जरूरत बताई, जिसके कारण लागत कई गुना बढ़ने की संभावना जतायी गयी थी।
वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी सरकार बनी तो उसने इस दिशा में फिर से प्रयास शुरू किया। पीएम की फ्रांस यात्रा के दौरान साल 2015 में भारत और फ्रांस के बीच इस विमान की खरीद को लेकर समझौता किया। इस समझौते में भारत ने जल्द से जल्द 36 राफेल विमान फ्लाइ-अवे यानी उड़ान के लिए तैयार विमान हासिल करने की बात कही। समझौते के अनुसार दोनों देश विमानों की आपूर्ति की शर्तों के लिए एक अंतर-सरकारी समझौता करने को सहमत हुए। समझौते के अनुसार विमानों की आपूर्ति भारतीय वायु सेना की जरूरतों के मुताबिक उसके द्वारा तय समय सीमा के भीतर होनी थी और विमान के साथ जुड़े तमाम सिस्टम और हथियारों की आपूर्ति भी वायुसेना द्वारा तय मानकों के अनुरूप होनी है। इसमें बताया गया कि लंबे समय तक विमानों के रखरखाव की जिम्मेदारी फ्रांस की होगी। सुरक्षा मामलों की कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद दोनों देशों के बीच 2016 में आईजीए हुआ। समझौते पर दस्तखत होने के करीब 18 महीने के भीतर विमानों की आपूर्ति शुरू करने की बात कही गयी है यानी 18 महीने के बाद फ्रांस की ओर से पहला राफेल लड़ाकू विमान भारत के सुपुर्द किया जाएगा।
एनडीए सरकार ने दावा किया कि यह सौदा उसने यूपीए से ज्यादा बेहतर कीमत में किया है और करीब 12,600 करोड़ रुपये बचाए हैं। लेकिन 36 विमानों के लिए हुए सौदे की लागत का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया। सरकार का दावा है कि पहले भी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की कोई बात नहीं थी, सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी की लाइसेंस देने की बात थी। परन्तु मौजूदा समझौते में 'मेक इन इंडिया' पहल किया गया है। फ्रांसीसी कंपनी भारत में मेक इन इंडिया को बढ़ावा देगी। यह मिसाइल 100 किमी दूर स्थित दुश्मन के विमान को भी मार गिरा सकती है। अभी चीन या पाकिस्तान किसी के पास भी इतना उन्नत विमान सिस्टम नहीं है।  
विपक्ष सवाल उठा रहा है कि अगर सरकार ने हजारों करोड़ रुपए बचा लिए हैं तो उसे आंकड़े सार्वजनिक करने में क्या दिक्कत है। कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि यूपीए 126 विमानों के लिए 54,000 करोड़ रुपये दे रही थी, जबकि मोदी सरकार सिर्फ 36 विमानों के लिए 58000 करोड़ दे रही है। कांग्रेस का आरोप है कि एक प्लेन की कीमत 1555 करोड़ रुपये हैं, जबकि कांग्रेस 428 करोड़ में रुपये में खरीद रही थी और इस सौदे में 'मेक इन इंडिया' का कोई प्रावधान नहीं है।

यूपीए के सौदे में विमानों के भारत में एसेंबलिंग में हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड को शामिल करने की बात थी। भारत में यही एक इकलौती ऐसी कंपनी है जो सैन्य विमान बनाती है। लेकिन एनडीए के सौदे में एचएएल को बाहर कर इस काम को एक निजी कंपनी को सौंपने की बात कही गई है। किसी भरोसेमंद सरकारी कंपनी की जगह अनाड़ी नई निजी कंपनी को शामिल करना कैसे उचित हो सकता है। यानी विरोधि‍यों के मुताबिक एनडीए सरकार एक निजी कंपनी को फायदा पहुंचा रही है। कांग्रेस का आरोप है कि सौदे से एचएएल को 25000 करोड़ रुपये का घाटा होगा।

चुनावी माहौल में जनता के सामने सरकार की पारदर्शिता ही उसे यक्ष के प्रश्नों से बचा सकती है।



भारत पर्यटन की दृष्टि से

सर्वमंगला मिश्रा
भारत वर्षों से पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता आया है। राम, कृष्ण, आदिगुरु शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, गौतम बुद्ध, विवेकानन्द, गुरुनानक की इस धरती पर हर शक्स जीवन में एकदफा तो कदम रखना ही चाहता है। यह वही भारत है जहां से आध्यात्म का बीज हर मानव के अंदर पनपता है। चाहे फाह्यान हो या वास्कोडिगामा सभी ने भारत भूमि की प्रशंसा ही की है। इतिहास गवाह है कि-भारत भूमि संस्कृति एवं सम्पदा दोनों से सदैव लदी हुई रही है तभी, महमूद गजनवी, जिसने 17 बार सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था। भारत की धरती पर जिसने भी आजतक कदम रखा, इतिहास गवाह है वह निहाल होकर ही गया।
भारत का पर्यटन और स्वास्थ्यप्रद पर्यटन मुहैया कराने की दृष्टि से विश्व में पाँचवा स्थान है। पर्यटन गरीबी दूर करने, रोजगार सृजन और सामाजिक सद्भाव बढ़ाने का सशक्त साधन है। भारत जैसे विरासत के धनी राष्ट्र के लिए पुरातात्विक विरासत केवल दार्शनिक स्थल भर नहीं होती वरन् इसके साथ ही वह राजस्व प्राप्ति का स्रोत और अनेक लोगों को रोजगार देने का माध्यम बना है| पर्यटकों के लिए कैम्पिंग स्थलों के संचालन करने से भी स्थानीय युवकों को रोजगार मिलता है। इसके लिए उन्हें प्रशिक्षित जनशक्ति की जरूरत पड़ेगी। कुछ स्थानीय युवकों को गाइड के रूप में काम करने के अवसर मिलता है। नवयुवक आने वाले पर्यटकों को आस पास की पहाडि़यों और जंगलों की सैर कराकर उन्हें अपने इलाके से परिचित कराते हैं। जिससे देश के स्वाभिमान में वृद्धि होती है। अपने इलाके की वनस्पतियों और जीव-जन्तुओं तथा ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों की तरह अपने समुदाय और लोक जीवन का परिचय देते हैं।  स्थानीय पर्यटन स्थलों को रोचक ढंग से प्रस्तुत करके रोजगार को बढ़ावा देते हैं। स्थानीय बुनकर और कारीगर अपने उत्पाद प्रदर्शित करके पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। जिससे ज्यादा पर्यटक आकर्षित होते हैं। कारीगर हस्तशिल्प और बनाए गए परिधानों को पर्यटकों के सामने प्रस्तुत करते हैं। जिससे कला का प्रदर्शन तो होता ही है साथ ही व्यापार में भी वृद्धि होती है। पर्यटन से स्थानीय युवकों को रोजगार के अवसर मिलते हैं। पर्यटन से सांस्कृतिक गतिविधियों में तेजी आती है और पर्यटकों तथा उनके मेजबानों के बीच बेहतर और समझदारी पूर्ण सम्बन्ध विकसित होते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर इससे विदेशी मुद्रा की मोटी कमाई होती है। जो किसी भी देश के लिए महत्वपूर्ण है। सच्चाई यह है कि दुनिया के 83 प्रतिशत विकासशील देशों में पर्यटन विदेशी मुद्रा अर्जित करने का प्रमुख साधन है। मोदी सरकार ने अपने तीन साल के कार्यकाल में पर्यटन क्षेत्र का कायाकल्प कर दिया है। पर्यटन के क्षेत्र में देश ने जिस गति से तरक्की हुई है उससे लगता है कि, भविष्य में दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर भी भारत अव्वल देशों में शामिल हो जाएगा। मात्र तीन वर्षों में देसी मानदंडों पर ही नहीं विदेशी मानदंडों पर भी पर्यटन के क्षेत्र में भारत की रैंकिंग काफी सुदृढ़ हुई है। विदेशी सैलानियों ने भारत को काफी अधिक महत्व देना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि देश में विदेशी सैलानियों के साथ ही विदेशी मुद्रा का भंडार भी भरने लगा है। मोदी सरकार ने देश की कमान संभालते ही जिन चीजों पर सबसे अधिक जोर देना शुरू किया था उनमें से पर्यटन भी एक है। इसके लिए प्रधानमंत्री ने खुद अपने स्तर पर पहल शुरू की थी। पीएम मोदी ने दुनियाभर में जाकर भारत के पर्यटन क्षेत्र को जीवंत बनाने की कोशिश की है। उनके उन्हीं प्रयासों और प्राथमिकताओं का असर अब दिखाई देने लगा है।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 मार्च को अपने मन की बात में कहा था - ये बात सही है कि टूरिज्म सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र है। गरीब से गरीब व्यक्ति कमाता है और जब टूरिस्ट, टूरिस्ट डेस्टिनेशन पर जाता है। टूरिस्ट जाएगा तो कुछ न कुछ तो लेगा। अमीर होगा तो ज्यादा खर्चा करेगा और टूरिज्म के द्वारा बहुत रोजगार की संभावना है। विश्व की तुलना में भारत टूरिज्म में अभी बहुत पीछे है। लेकिन हम सवा सौ करोड़ देशवासी तय करें कि हमें अपने टूरिज्म को बल देना है तो हम दुनिया को आकर्षित कर सकते हैं। विश्व के टूरिज्म के एक बहुत बड़े हिस्से को हमारी ओर आकर्षित कर सकते हैं और हमारे देश के करोड़ों-करोड़ों नौजवानों को रोजगार के अवसर उपलब्ध करा सकते हैं। सरकार हो, संस्थाएं हों, समाज हो, नागरिक हों, हम सब को मिल करके ये काम करना है
भारत प्रतिवर्ष विश्व पर्यटन दिवस मनाता है। प्रकृति की गोद में जो परम आनंद मिलता है, ज़ो सुकून मिलता है, शांति का आभास होता है वो और कहीं नहीं मिल सकता। भारत के पास नैसर्गिक संसाधन बेशूमार है। कुदरत का करिश्मा विश्व के हर कोने में हैं। प्रकृति का आलोकिक रूप देखकर आनंदित होता है। रमणीक स्थलों में कुदरत का नज़ारा मन को अद्भुत शांति प्रदान करता है। प्राकृतिक खजाना चहुंओर फैला पड़ा है। उँचे पहाड़, कल-कल करते झरने, मधुरतान अलापते रंग बिरंगे पंछी, महकते फूल, चारों ओर जैसे प्रकृति अपने आप सज धज हमे पुकार रही हो। भारत का आध्यात्म विश्व को आमंत्रित करता है। भारत अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपरा को परिलिक्षित करता है और विश्व का हर पर्यटक आने को विवश हो जाता है। यह स्वाभाविक है कि भारत पर्यटन के क्षेत्र में देश जैसे-जैसे विकास करेगा, रोजगार के मौके भी बढ़ते जाएंगे और विदेशी मुद्रा भंडार में भी बढ़ोत्तरी होती जाएगी।
मार्च 2006 में अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश जब भारत आये, तब भारत और अमेरिका के बीच परमाणु करार होना था और वह हुआ भी लेकिन इस गंभीर मुद्दे के बीच उनका एक बयान भी छाया रहा कि अमेरिका भारतीय आम खाना चाहता है। इसके उपरांत अमेरिका ने भारतीय कृषि उत्पादों के आयात पर भी एक समझौता किया। उसके अगले साल से ही 17 वर्षों के उपरांत ही सही अमेरिकावासी भारतीय आम का स्वाद चखने लगे। इससे जाहिर होता है कि भारत की मिट्टी पर चाहे कोई आया हो या मिट्टी की खुशबू उस तक पहुंची हो वो शक्स भारत का दीवाना हो जाता है।
वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम के अनुसार मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद भारत में पर्यटन के क्षेत्र में काफी सुधार हुआ है। डब्लूईएफ की ट्रैवल एंड टूरिज्म की काम्पिटीटिव रिपोर्ट 2017 (WEF की Travel & Tourism, Competitiveness Report 2017) की हालिया रैंकिंग में भारत ने 12 अंकों की ऊंची छलांग लगाई है। भारतीय टूरिज्म की रैंकिंग 52वें पायदान से ऊपर चढ़कर 40वें पायदान पर पहुंच गई है। जहां साल 2013 में भारत 65वें नंबर पर था, वहीं 2015 में 52वें नंबर पर आ गया और महज डेढ़ साल के भीतर 12 अंकों की छलांग लगाते हुए 40वें पायदान पर जा पहुंचा है। पर्यटकों के आगमन के मामले में जापान के पांच और चीन के दो अंक के मुकाबले भारत को 12 अंकों का फायदा हुआ है। जबकि अमेरिका शून्य से दो अंक नीचे और स्विट्जरलैंड शून्य से चार अंक नीचे रहा है। सबसे बड़ी बात ये है कि पर्यटकों की सुरक्षा के मामले में भी भारत 15वें स्थान पर आ गया है। यही नहीं पर्यटन से राजस्व में भी भारी बढ़ोत्तरी हुई है। यह 2015 में 1.35 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2016 में 1,55,650 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इस तरह से विदेशी मुद्रा की कमाई में 15.1 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई। पर्यटन मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2017 में देश में 1.01 करोड़ पर्यटक आए जबकि 2016 में यह आंकड़ा 88.04 लाख था। इस तरह 2017 में भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में 15.06 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। खास बात यह है कि भारत आने वाले सबसे ज्यादा विदेशी पर्यटक बांग्लादेशी हैं। कुछ समय पहले तक भारत में सर्वाधिक विदेशी पर्यटक अमेरिका जैसे विकसित देशों से आते थे लेकिन बीते दो साल में बांग्लादेश ने इस मामले में विकसित देशों को पीछे छोड़ दिया है
वैसे 2016-17 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2015 में 80.3 लाख पर्यटक भारत घूमने आए थे, तो 2016 में उससे 10.7 प्रतिशत अधिक यानि 88.9 लाख विदेशी पर्यटक भारत की यात्रा पर पहुंचे थे। बड़ी बात ये है कि ई-वीजा की सुविधा मिलने के बाद से भारत के प्रति विदेशी सैलानियों की रूचि और बढ़ी है और वो बड़ी संख्या में भारत का रुख कर रहे हैं। जैसे इस साल जनवरी से मार्च के बीच 4.67 लाख विदेशी सैलानी ई-वीजा पर भारत आए जो कि पिछले साल इसी अवधि के 3.21 लाख पर्यटकों की तुलना में 45.6 प्रतिशत अधिक है। भारत आने वाले पर्यटकों को किसी तरह की असुविधा न हो इसे देखते हुए अभी 161 देशों के नागरिकों को ये सुविधा दी जा रही है। भारत ने अपने पर्यटकों को वेलकम कार्ड देना भी शुरू किया है, जिनसे सैलानियों को सभी महत्वपूर्ण जानकारियों मिल जाएं और उन्हें किसी तरह की दिक्कतों का सामना न करना पड़े। केंद्र सरकार स्वदेश दर्शन के तर्ज पर टूरिस्ट सर्किट का विकास कर रही है। इस योजना के तहत 13 सर्किट को चुना गया है। पूर्वोत्तर भारत, हिमालयन, बौद्ध, तटीय, मरुस्थल, जन जातीय, कृष्णा, इको, ग्रामीण, आध्यात्मिक, रामायण और विरासत सर्किट योजना के तहत आते हैं। इस योजना के तहत 2601.76 करोड़ रुपये की लागत वाली सभी 31 परियोजनां पर कार्य पूर्ण करने की योजना है।
पर्यटन, सेवा क्षेत्र का एक ऐसा उभरता हुआ उद्योग है जिसमें अपार संभावनाएं निहित हैं। भारत अतुलनीय प्राकृतिक स्थलों के साथ ही वैश्विक स्तर पर एक बड़े जैविक आयामों के क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। पर्यटकों के लिए भारतीय बाजार विविधताओं भरा स्थान है। इन विविधताओं के आर्थिक पहलुओं को देखते हुए शिल्प आदि क्षेत्रों के संवर्धन हेतु ठोस सरकारी प्रयासों का परिणाम एक नई आर्थिक संभावना के रूप में देखा जा सकता है तथा नए चिन्हित पर्यटन स्थलों पर ढांचागत सुविधाओं का विकास कर न केवल शहरी बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसरों की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है। सुरक्षा के साथ विदेशियों को भी भारत के गांवों की सैर करायी जा सकती है। जिससे पर्यटन को बहुत बढ़ावा मिल सकता है और वहां के लोगों को रोजगार।


  मिस्टिरियस मुम्बई  में-  सुशांत का अशांत रहस्य सर्वमंगला मिश्रा मुम्बई महानगरी मायानगरी, जहां चीजें हवा की परत की तरह बदलती हैं। सुशां...