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Monday, 20 April 2015

ये कैसा अन्नदाता ??

सर्वमंगला मिश्रा
9717827056

जीवन की प्रक्रिया एक चक्र में बंधी है। चक्रक्रम में उलट –फेर होने से नियमितता अनियमितता में परिवर्तित हो जाती है। ऐसा ही कुछ इस साल हमारे देश के अन्नदाताओं के साथ हो गया। किसानों का देश कहा जाने वाला भारत यूं तो कई दशकों के बाद अब दूसरी चीजों में पारंगत हो जाने से कई क्षेत्रों में अपने विशेषाधिकार के लिए जाना जाता है। पर, इस साल, मौसम की मार ने हमारे देश के अन्नदाताओं को तोड़ दिया। किसान फसल उगाही के लिए बीज खरीदने से लेकर ट्रैक्टर से खेत जोतने तक के काम के लिए किसान कर्ज लेता है। कर्ज बैंक अथवा किसी व्यक्ति से लेता है। जिसकी सीमा और आस दोनों फसल के उगने तक होती है। किस्मत बन जाती है अथवा सब बिखर जाता है। इस साल मध्य प्रदेश के भिंड जिले में पिछले 10 दिनों में 6 किसानों ने आत्महत्या कर ली। महाराष्ट्र के कई इलाकों में ऐसा वाकया प्राय: हर साल देखने में आता है। विदर्भ के इलाकों में किसानों की यह दशा आम हो गयी है। पिछले वर्ष के आंकड़ों पर गौर करें तो 510 किसानों ने खुदखुशी कर ली थी। जबकि 2015 का यह चौथा महीना ही है और आंकड़ा 105 तक पहुंच चुका है। किसानों की मृत्यु का एक ही कारण सामने आता है- फसल की बर्बादी। जिससे निराश हताश किसान जो अपनी उम्र के मध्य में संघर्ष को झेल सकने में स्वंय को असमर्थ पाते हैं और जीवन का अंत कर बैठते हैं। ओलावृष्टि के हथगोलों ने इस बार किसानों की जैसे कमर ही तोड़ दी। अकेले मराठवाड़ा में किसानों के आत्महत्या का सिलसिला 200 के पार पहुंच चुका है। सवाल यह उठता है कि जिस किसान के भरोसे देश की आबादी अपना भरण पोषण करती है आज वही किसान अपनी दर्दनाक कहानी बिना किसी को सुनाये अपनी जमीन में दम तोड़ने को मजबूर हो रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें योजनायें तो कई लाती हैं जिससे किसान फलीभूत हों पर वास्विकता सच से परे ही होती है। सच्चाई आज देश के सामने है जवान देश के लिए देश की सरहद पर दम तोड़ रहा है और अन्नदाता घर के अंदर। दोनों अपने सपनों का गला घोंट रहे हैं। तमाम आफिसर्स जिनकी सरकार नहीं बदलती उन्हें मात्र अपनी रिटार्यमेंट के अलावा कभी नौकरी या रोजी रोटी की चिंता नहीं होती। शायद यही वजह है कि उन्हें किसानों का या किसी भी बेसहारों का दर्द कचोटता नहीं। तभी गफलत करने में माहिर, जब सरकारें योजना बनकर बांध के पानी की तरह छोड़ती है तो जरुरतमंदों तक प्लास्टिक पाउच में पानी पहुंच पाता है। जिससे योजनाओं की किरकिरी हो जाती है।

किसान दो तरीके से खेती से जुड़ा होता है। उसकी ज़मीन, उसकी खेती पूर्णरुपेण खेती पर निर्भर। परिवार के कुछ सदस्य जो दूसरे शहरों में जाकर नौकरी करते हैं तो परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करने में कुछ राहत मिल जाती है। परन्तु जिनका परिवार ही कृषि कार्य पर निर्भर है समस्या उनकी है। दूसरा किसान कम, मजदूर होता है और दिहाड़ी पर पलता है। यानी उसकी जमीन और कर्ज से कोई वास्ता नहीं होता। आत्महत्या का रास्ता वही किसान अपनाते हैं जिनका सारा दारोमदार उनकी खेती पर होता है। जिनकी आमदनी का और कोई जुगाड़ नहीं होता। अपनी छोटी सी जमीन पर खेती कर साल भर जीवन यापन का स्वप्न पालते हैं। बच्चों की पढाई, शादी, घर के तमाम खर्च कर्ज चुका पाने के बाद एक मुस्कान की आस में पूस की रात में खेतों में आकाश के नीचे सोते हैं तो कहीं अपनी मिट्टी की कुटिया में या झोपड़ी में। नैशनल क्राइम रिकार्डस ब्यूरो के अनुसार 2012 में 135,445 मौतें हुई। जिसमें तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पं. बंगाल, आंध्र प्रदेश राज्यों में पाया गया कि 25.6 पारिवारिक समस्या, 20.8 बीमारी, 2.0 अकस्मात आर्थिक अवस्था में परिवर्तन, 1.9 गरीबी के कारण मौतें हुई। गुजरात का प्रतिशत बहुत कम रहा। गंभीर समस्या यह भी है कि सालों से देश कृषि कार्य पर निर्भर है। मौसम की मार अमूमन कुछ एक साल को छोड़कर प्राय: यही दृश्य देखने को मिलता है। सरकार को छोटे किसानों की अवस्था को ध्यान में रखते हुए बीमा पालिसी जैसी कुछ योजनाओं को प्रश्रय देना चाहिए। जिससे फसल नुकसान भी हो जाये तो आत्महत्या की नौबत उनके दहलीज पर कदम ना रखे।सरकार हर साल प्रकृति के कुपित होने पर ही नहीं बल्कि, उनके परिवार के भरण पोषण की समस्या उनके सामने दानव की तरह मुंह फैलाकर ना खड़ी हो। एक सर्वे में यह भी पाया गया की 1953 से लेकर अब तक किसानों की संख्या में भारी कमी आई है। इसकी बड़ी वजह खेती को शहरी एवं पढे लिखे ज्ञानी जन का हेय दृष्टि से देखना, उनके कार्यक्षमता को कम आंकना। जिससे कृषक वर्ग पहले से ही शहरी नौकरी से प्रभावित होने लगा। अब देश की आस्था और कृषक विलुप्त ना हों इसके लिए केँद्र एवं राज्य सरकारों को मुहिम चलानी आवश्यक है। प्रधानमंत्री मोदी जी ने किसानों से अपने मन की बात तो कह दी पर शायद उनकी सुनी नहीं। कम ब्याज दर पर उपलब्ध ऋण से किसान अपना व्यवसाय शुरु तो तब कर सकेंगें जब ग्राम प्रधान से लेकर तमाम बाबूओं को घूस देने से कुछ बच पायेगा। आखिर किसान कितनी परीक्षा देगा अपनी सहनशक्ति की। देश अपने अन्नदाताओं के लिए कब सोचेगा।




शासक और शासन

सर्वमंगला मिश्रा
9717827056


कुछ चीजों का जिक्र होते ही मस्तिष्क कौंधने लगता है। एक छवि जो चैतन्यअवस्था अथवा अर्धसुसुप्तावस्था में भी एक समान अपनी प्रक्रिया देता है। जिसतरह भारत पाक का क्रिकेट मैच, कश्मीर मसला या आरक्षण का मुद्दा। देश जब एक छत्र शासन के तहत था, जब अंग्रेजों के अधीन था और जब स्वतंत्र हो गया पर, प्रत्येक शासनकाल के तहत वैमनस्यता शासन प्रणाली, शासक और जनता के बीच एक अविश्वसनीय विवाद के रुप में जन्म लेता आया है और लेता रहेगा। यह प्रकृति का नियम है।शासक आदिकाल से अपने प्रभुत्व को स्थापित करने वाला होता है। समय का कालचक्र जब अपनी परिधि बदलता है तो आकाश से लेकर पाताल तक परिस्थतियां पूर्णरुपेण बदल जाती हैं। इसी तरह समय ने करवट ली और हिन्दु शासकों के स्थान पर मुस्लिम शासनकाल आया। समय चक्र फिर घूमा और दासत्व का जीवन भोगने को मजबूर हो गये भारतवासी। काल परिधि फिर बदली और देश स्वतंत्र हो गया। इसी तरह सरदार पटेल के रहते हुए भी जवाहरलाल देश के पहले प्रधानमंत्री बने। उसके बाद धीरे धीरे परंपरावाद में शासनकाल परिवर्तित होने लगा और इंदिरा गांधी के मरणोपरांत राजीव गांधी को देश के सबसे प्रमुख पद पर आसीन कर दिया। समय की सीमा समाप्त हो गयी और सोनिया गांधी ने सीताराम केसरी को रिप्लेस किया। हवा यूं तो रुकती नहीं पर लगता है ठहर सी गयी है। चुनौती हर किसी के सामने खड़ी होती है। चुनौती आज राहुल गांधी है-देश के लिए, देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए। आज देश का हर शक्स यह जानने को कहीं न कहीं उत्सुक है कि राहुल बाबा कहां गायब है। क्या यह समझा जाय कि राहुल अब बोझिल राजनीति से बोर हो चुके हैं और अपने जीवन को किसी दूसरी राह की तरफ मोड़ने को उत्सुक हैं। देश आज यही विचार कर रहा है कि अगर राहुल बाबा को दायित्व दिया होता तो क्या होता ? चुनौतियों से क्या मुंह मोड़ लेते राहुल गांधी। जिस परिवार ने तानाशाही से लेकर हर चुनौती को परास्त किया। उसी घर का चिराग आज कमजोर साबित हो रहा है।
चुनौती मोदी ने दी-राहुल को।
मोदी ने अनगिनत बीहड़ पहाड़ को काटकर अपना रास्ता स्वंय बनाया। पथिक जंगल-पहाड़ जैसे दुर्गम रास्तों से होता हुआ मंजिल तक जब पहुंचता है तो विश्वविजेता कहलाता है। मोदी आज विश्वविजेता के रुप में देखे जा रहे हैं। इस विश्वविजेता के सामने देश की तमाम चुनौतियां हैं। गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी, धांधली, घोटाला, भ्रष्टाचार और आतंकवाद। प्रधानमंत्री ने देश की 100 करोड़ जनता से यह वायदा किया है कि देश को बदलकर रख दूंगा आप मुझे एक मौका तो दो। जनता जनार्दन कही जाती है। जनता ने अपने आर्तनाद को सुना और बाहर से मोदी के शंखनाद को। अब साल पूरा होने जा रहा है मोदी सरकार को। मोदी जी ने सबसे छोटे देश भूटान से लेकर सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश तक की यात्रा कर ली और आमंत्रित कर मेहमाननवाज़ी भी कर डाली। अब तक एक दर्जन से भी ज्यादा विदेश यात्रा कर चुके मोदी जी ने देश के कितने महत्वपूर्ण मसले सुलझाये ? स्वयं प्रधानमंत्री बनने से पहले कर्नाटक में अपना दम खम दिखाने से शुरु कर अपने प्रधानमंत्री बनने के बाद भी दिल्ली की कुर्सी के लिए सतत प्रयत्नशील रहे मोदी। यानी चुनाव-चुनाव और सिर्फ चुनावों में व्यस्त रहे मोदी जी। अभी कनाड़, जर्मनी जैसे देशों की यात्रा पर 09 अप्रैल को रवाना हो गये। अगले महीने फिर चीन के बिजिंग की यात्रा पर रवाना होंगे।


कश्मीर के साथ- साथ चीन से भी भारत को एक अनजान सी बेरुखी का एहसास बीच बीच में होता रहता है। कश्मीर मुद्दा भारत की आजादी के साथ साथ चल रहा है। अरुणांचल प्रदेश पर चल रही सहमी राजनीति कहीं खुलकर विरोध की चिनगारी से ज्वालामुखी न बन जाये। मसले मात्र दो नहीं अनेक हैं पर मोदी जी की रमनीति क्या है। क्या सिर्फ विदेश यात्रा करने से देश सफलता की ऊंचाइयों को छूने में सक्षम हो सकेगा। आज मौसम की मार से किसान पूरे देश का सिसक रहा है। मजबूरी की इंतेहां जबाव दे दे रही है और किसान मौत को गले लगा रहा है। देश का किसान जब मौत की नींद सो जायेगा तो भविष्य खुशहाल कैसा जिंदा रह पायेगा। विडियो कांफ्रेसिंग और रेडियो के जरिये बात करना एक सुखद एवं सरल माध्यम है अपनी बात उन लोगों तक पहुंचाने के लिए जिनसे संपर्क साधना कठिन है। पर, मोदी अपनी प्लानिंग के लिए जाने जाते हैं। गरीब किसानों, बेसहारा बच्चों और महलाओं के लिए कया स्ट्रैटेजी है सरकार की। योजना लागू करना तो प्रत्येक शासनकाल से होता चला आ रहा है। नयापन और वायदा किस उम्मीद केसागर में गोते लगा रहा है।

 कश्मीर का ब्रह्म

सर्वमंगला मिश्रा-स्नेहा
9717827056


1947 में आजादी मिली और साथ ही एक नये देश का आविर्भाव भी हुआ। जनमानस से कहा गया कि जो जिधर जाना चाहता है वो उधर जा सकता है। जिस तरह महाभारत के युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व युद्ध में खड़े दोनों पक्षों को खुली छूट दी गयी थी कि जो योद्धा दल बदलना चाहते हों वो युद्ध छिड़ने के अंतिम क्षणों में दल परिवर्तन कर सकते हैं।उस समय सिर्फ युयुत्सु ही मात्र आये थे कौरवों से पांडवों की सेना में। ठीक इसी तर्ज पर भारत और पाकिस्तान बंटवारा के वक्त मुस्लिम समुदाय को पूर्णरुपेण छूट दी गयी कि वो जिधर चाहें उधर जा सकते हैं। कुछ लोग जो बंटवारा होने से पहले पाकिस्तान नहीं गये और फैसला लेने में देर कर दी उन्हें आज भी पाकिस्तान में शरण नहीं मिली अलबत्ता उन्हें काफिर की संज्ञा मिल गयी। भारत पाकिस्तान के बीच सीमा उल्लंघन विवाद वर्षों से चला आ रहा है। जिसके कारण हमारे हजारों जवान आज तक शरहद पर अपनी कुर्बानी दे चुके हैं। पर सरकारें चेतती नहीं है। कश्मीर जिसे धरती का स्वर्ग कहा जाता है।आज विवाद से युक्त और रक्तरंजित हो चुका है। यह राजनीतिक चाल ही लगती है जहां भारत के नियम कानून लागू नहीं होते। ऐसा प्रतीत होता है जैसे एक छत के नीचे दो दुनिया बसा दी गयी हो। भारत में आने जाने पर कश्मीरी अवाम को रोक नहीं पर भारत के किसी भी हिस्से से जाकर खुद को उस राज्य में स्थापित करना कठिन प्रक्रिया है। क्या वहां प्रारम्भ से ही बंटवारे के बाद सांठ-गांठ हो गयी थी और देश की जनता को धोखे में रखा गया। मुद्दा विचारणीय है पर 1990 में जो हुआ वह देश के लिए शर्मनाक वाक्या था। कश्मीरी पंडितों को लाचार और बेबस कर उन्हें वहां से खदेड़ दिया गया था। पंडित जिन्हें वेद और शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण ब्रह्म के समान माना जाता रहा है। शरीर में उसका निवास मस्तिष्क से लेकर मुख तक का भाग बताया गया है। आदिकाल से ब्राह्मण वेदों और शास्त्रों के ज्ञाता होते थे। वो देश और समाज को ज्ञान दिया करते थे। कहा भी जाता है कि राजा की पूजा सिर्फ उसके राज्य अथवा देश में की जाती है पर ज्ञानी जन की पूजा पूरे धरती पर होती है। पर यह कैसा सम्मान जो अपमान के घूंट पीने पर उन ब्रह्मणों को मजबूर किया गया। जिसकी पूजा तो दूर शांति और सम्मान से उन्हें उनके घरों में रहने तक नहीं दिया, बेघर कर दिया गया। वो जख़्म अब दो दशक से भी ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद हरे हो रहे हैं।
हाल ही में ओमर अबदुल्ला की सरकार को पटखनी देकर और बीजेपी से हाथ मिलाकर पीडीपी सत्ता पर काबिज़ हुई है। नई पार्टी के साथ नये मुद्दे भी राज्य में गरमा रहे हैं। हालांकि कई बार कश्मीरी पंडितों को वापस बुलाने का मसला उठता रहा है। पार्टी उन कश्मीरी पंडितों को वापस बुलाने का सपना सा दिखा रही है या बीजेपी को जमीनी हकीकत से आगाह करा रही है कि अगर इस मुद्दे का इम्प्लीमेंटेशन हुआ तो कश्मीर की हालत क्या हो सकती है। क्योंकि हाल ही में कश्मीरी पंडितों को एक अलग इलाके में स्थापित करने की योजना पर पहल हुई है। यह योजना कितनी कारगर साबित होगी यह तो भविष्य में की जाने वाली पहल से ही निर्णय निर्धारित हो सकेगा। यह जग जाहिर बात है कि यदि उन खदेड़े हुए लोगों से कश्मीरी सरकार को इतना लगाव होता तो यह कदम ही क्यों उठाते ?इतनी संख्या में कश्मीरी पंडित अपनी जान बचाकर क्यों भागते ? उन पर जो अमानवीय अत्याचार हुए ह्यूमन राइटस का खुलकर उल्लंघन हुआ। इसकी जवाबदेही किसकी हुई। नैशनल काफ्रेंस की जिसकी सरकार उस वक्त राज कर रही थी और सीएम फारुक अबदुल्ला साहब थे। देखा जाय तो कश्मीर पर सबसे ज्यादा 1982 से एकाधिकार सा रहा अबदुल्ला साहब का। हालांकि राष्ट्रपति शासन भी हर एक साल अथवा 2 साल के अंतराल पर लगता रहा। विचारणीय है कि नैशनल कांफ्रेस पार्टी कश्मीरी पंड़ितों के हक में नहीं सोचती। पुनर्वास की योजना में कई दिलचस्पी नहीं रही ओमर अबदुल्ला साहब की। इसका तातपर्य स्पष्ट है कि संदिग्धता बरकरार है।
जिस तरह महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश और बिहार के राज्यों से जाकर बसे लोगों को खदेड़ा गया था। यह मुद्दा उठाया गया कि मराठी लोगों का ही बोलबाला महाराष्ट्र में होना चाहिए। वहां के प्रमुख नेता ने अपनी बुलंद आवाज में अमिताभ बच्चन जैसे लोगों पर भी निशाना साधा कि आज तक उन्होंने महाराष्ट्र के लिए क्या योगदान दिया है। वैसे देखा जाय तो हर क्षेत्र में कुछ संदिग्ध मानसिकता व्याप्त है। जिससे देश के बने संविधान पर कहीं न कहीं प्रश्नवाचक चिन्ह सा लग जाता है। कि क्या भारतवासी एक राज्य से दूसरे राज्य में भ्रमण और निवास करने के लिए स्वतंत्र हैं या नहीं। संविधान की अवमानना नहीं तो और क्या है। पुनर्वास योजना उन कश्मीरी पंड़ितों के जख्म पर मरहम नहीं बल्कि उसे कुरेदा जा रहा है। यह कैसी प्लानिंग है कि जितने लोगों को पुनर्वास के तहत वापस आने का निमंत्रण दिया जा रहा है वह सब उस एक तरफा कालोनी में सुरक्षित रहेंगें। उन पर फिर कोई आक्रमण न होगा। अगर उन्हें उस प्रतिबंधित कालोनी में ही रहना है तो क्या उचित व्यवस्थाएं हैं जैसे अस्पताल, कालेज, यूनिवर्सिटी और मुख्य तौर पर व्यक्ति का व्यापार अथवा नौकरी। इन सब चीजों की आवश्यकता क्या उन लोगों को नहीं होगी जिन्हें पुनर्वास के तहत बसाये जाने की तैयारी का खाका खींचा जा रहा है। सवाल और भी बेहद गंभीर हैं जिन्हें समझने की आवश्यकता है यहां। सवाल क्या वहां के लोंगों के घूमने फिरने की जगह जहां वो लोग पहले जाने के आदि थे अब नहीं जा सकेंगे या उस जैसा स्थान उस प्रतिष्ठित कालोनी में बनाया जायेगा या ऐसी कोई योजना सरकारी पेपर पर आंकी गयी है। इसके अलावा जिन लोगों के घर उस वक्त औने पौने दाम में बेंच दिये गये थे क्या आज कश्मीरी हूकूमत अपने इस नये अव्यवस्थित आवाम को मुहैया कराने में सक्षम हो पायेगी। क्या सरकार उन लोगों को बरबस बेबस करेगी कि उनके कानून के तहत ही चलना होगा अन्यथा खामियाज़ा भुगतने को फिर तैयार रहना होगा। अमूमन 25 साल का वक्त दूसरे राज्यों में बीताने के बाद, हजारों संकट झेलने के बाद क्या यह जनता वापस जाना चाहती है। जहां उनके अपनों का कत्ल उनकी आंखों के सामने हुआ था। उस पीड़ा को भुलाने में जहां उन परिवारों को सालों लग गये और अब जब तस्वीर हल्की सी धुंधली होने लगी थी तो सरकार ने उस बंद घाव के उपर से पट्टी हटाकर उसका दर्द और बढ़ा दिया है। जिन लोगों ने 22-24 साल खून पसीना एक कर नये तरीके से अपने जिदगी की शुरुआत की और आगे बढे क्या वो लोग फिर से पीछे मुड़कर देखना चाहेंगे।
जिंदगी की शाम इंसान के जीवन में पल भर का ही सही एक ठहराव लाती है जहां व्यक्ति कुछ सोचना चाहता है आज वही शाम उन कश्मीरी पंड़ितों के जीवन में आ गयी है कि क्या करें और क्या ना करें। कानून और सरकार पर भरोसा करना यानी अपना और आने वाले कल को दांव पर लगाने जैसा है। पर जो आज तक इसी सपने के सहारे जी रहे थे उनके लिए अमृत की एक बूंद है जिनकी आंखों में आज भी अपने घर का लान की याद हरी घास की तरह ताजा है। सोचने वाली बात यह है कि क्या उन्हें उनकी पुरानी प्रापर्टी अब नसीब हो पायेगी? क्योंकि अब प्रापर्टी के दाम बढ चुके हैं। भले आज आतंकी साये में कश्मीर जी रहा हो पर मेहमान से व्यापारी वसूल ही लेगा और चाहत की कीमत इंसान को चुकानी ही पड़ती है।



केंद्र और राज्य सरकारें अगर वाकई इस मुद्दे को लेकर गंभीर हैं तो माहौल बदलना होगा आवाम का का आवाम के लिए। वरना जिस तरह दंगे आये दिन दिख रहे हैं ऐसे हालात में कोई कश्मीरी पंड़ित स्वयं को कैसे महफूस मान सकेंगे। वहां की सरकार को भरोसा दिलाना होगा कि अब उन पुनर्वासियों पर कोई हथकंड़ा नहीं अपनाया जायेगा या फिर से उन्हें बेघर नहीं किया जायेगा चाहे सरकार बदले या न बदले। त्रिशंकु वाली हालत फिर ना हों इसके लिए सरकार को मुनासिब कदम उठाने होंगे। जिससे पुरानी योदें कचोटे नहीं बल्कि मरहम का काम करें।

Sunday, 1 March 2015

                                                        कांग्रेस का पलड़ा
 
 

सर्वमंगला मिश्रा

असल राजनीति करने के लिए सब्र रखने की ताकत होनी चाहिए। कांग्रेस को एक बार फिर मौका मिल ही गया। एक दशक तक राज करने वाली पार्टी अपनी नाकामियों को चुपचाप बर्दाश्त करती रही। आम बजट पेश होने के बाद जब जनता के हाथ निराशा लगी और साथ ही जनता के रोश को हवा देने में अब कांग्रेस पूरी तरह जुट सी गयी है। इसमें अहम भूमिका निभाने वालों में दिग्गी राजा अपने अनुभव के तर्ज पर शतरंज की चाल खेलने को बेताब से दिख रहे हैं। राहुल गांधी जो अपने चारित्रिक विशेषताओं के लिए फेमस हैं। हर बार जब भी पार्लियामेंट सेशन प्रारंभ होते ही वो गायब हो जाते हैं। इस बार आश्चर्यजनक तरीके से राहुल के गुमशुदा होने से राजनीति में हलचल से ज्यादा माखौल बन गया। हर जगह खोज बीन ऐसी शुरु हुई कि कुछ दलों ने तो बकायदा गुमशुदगी के पोस्टर लगा दिये और, इनामी राशि भी ऐलान कर दी । मोदी के भाषण का असर अब खत्म सा हो रहा है। सूर्योदय के उपरांत सूर्य मध्यान्ह में जाना चाहिए पर यहां तो अस्ताचलगामी लग रहा है। भारत की जनता को बजट से जुड़ी सारी आशायें धराशाही हो गयी हैं। डीज़ल - पेट्रोल के दाम घटते घटते अचानक इतने बढ़ा दिये गये कि अच्छे दिन का सपना जिस तरह कांग्रेस की सरकार के वक्त या अन्य सरकारों के समय में लगता था वैसे ही अब मोदी के पाले में जीने वाली जनता को भी लगने लगी है। कहां गये वो लम्बे लम्बे भाषणों के पुल ? जो लोकसभा चुनाव के वक्त मोदी अपने हर भाषण में हर राज्य में जाकर कहते थे। मंगल ग्रह पर 6 रुपये प्रति किमी की दर से पहुंचाने वाले मोदी ने आज अपने शासनकाल के पहले बजट में ही लोगों की आंखें नीची कर दी। ऐसा कोई भी उत्पाद जो य़ुवा वर्ग उपयोग करता हो वो सस्ता हुआ हो। मोबाइल, लैपटाप से लेकर प्रत्येक उत्पाद अब आसमान की ऊंचाई पर पहुंच चुका है। रेस्टोरेंट में जाने में मध्यवर्ग अब हिचकिचायेगा। क्या यह एक चाल है युवाओं को पाश्चात्य सभ्यता से दूर करने की। पर यह कैसी रणनीति ?  क्योंकि मोबाइल बिल हर वर्ग इस्तेमाल करता है। रेस्टोरेंट में खाना अब आम आदमी की चाहत पसीना बहाकर ही जा पायेगा। सींमेट भी महंगा, हर ऐशो आराम की चीज महंगी। क्या यही दिन मोदी जी ने चुनाव के पहले लाने का वायदा किया था। गुजरात में आटोवाला  10 रुपये में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाता है। पर देश की दूरियां मोदी जी ने कितनी बढ़ा दीं उन्हें अंदाजा  भी नहीं होगा।

यही बजट अगर कांग्रेस की सरकार लाती तो क्या यही भारत की जनता उसे माफ़ कर देती। कांग्रेस में उफान है तो सघर्ष का दौर भी। एक तरफ जहां 130 साल से ज्यादा सावन देख लेने वाली सरकार को अपना मुखौटा नहीं मिल रहा। वहीं कुछ पुराने हाथ उसे छोड़ नहीं पा रहे। वहीं अंदरुनी कलह जहां बगावत का रुख कर चुका है। बगावत अपने पैर मजबूत करने में लगी है। तो कुछ बेखौफ जबान अब रास्ते अख्तियार कर रहे हैं कि राहुल भइया कुर्सी छोड़ो दूसरों को भी मौका दो। अब पार्टी की बरक्कत जिस शक्स से नामुमकिन लगे वो उनका कर्णधार नहीं हो सकता। अपने भविष्य को उज्जवल करने का राहुल गांधी के पास अब और कोई बागडोर न हाथ आ सकती है और ना ही आने वाली है। पर, इन सब बातों का पार्टी क्यों ख़ामियाजा भुगते ? देश क्यों भुगते? एक वरिष्ठ पार्टी जो अपना अस्तित्व दिन पर दिन खोती चली जा रही है परंपरावाद के झांसे में। यह भारत की जनता को ही क्यों विश्व की किसी भी जनता को बर्दाश्त नहीं होगा। अगर परंपरा ही चलानी है तो मजबूत हाथों में बागडोर सौंप देनी चाहिए। पार्टी आज की तारीख में राहुल बाबा को नहीं प्रियंका गांधी को चाहती है। जिसतरह राजीव गांधी की मौत के बाद देश में एक लहर गूंजी थी - सोनिया लाओ देश बचाओ- वो दशक 1991 के बाद का था पर सोनिया गांधी ने चुप्पी साधी और चुप्पी तोड़ी प्रियंका गांधी की शादी के बाद। 1997 में सीताराम केसरी को पदच्यूत कर आसीन हुई थीं। हालांकि वो एक दौर था जब कांग्रेस तलवार के साथ पर धार विहीन थी। सोनिया गांधी के आने से कांग्रेसियों का मनोबल बढ़ा था क्योकि राजीव गांधी से एक मानवीय जुड़ाव हो चुका था। एक अपेक्षा थी कि देश के नाम एक कम अनुभवी राजनेता, जिसने देश को बखूबी पांच साल चलाया। उसके परिवार की एक और सदस्या भी देश के प्रति ऐसी ही श्रद्धा और आत्मसमर्पण करेगी। पर दिन गुजरता गया, साल गुजरता चला गया मंशा बदलती गयी और लोगों को कानों कान खबर तक नहीं हुई। साल 2004, 22 मई जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री के पद को अस्वीकार कर दिया था तो देश उनकी वंदना करने लगा। ऐसी शक्सियत भारत में ही नेहरु और गांधी परिवार में ही पनप सकता है। एक इटली से आयी लड़की भारतीय बहू के बाद एक मां बन गयी। जिसे ममता ने मजबूर कर दिया और राजनीति की परंपरागत रिश्तों में अपने रिश्ते को भी पूर्ण करने में लग गयी। राहुल घर का चिराग, को मां अब विद्दुत परियोजना में तबदील करने पर तूल गयी। जिसके बिना विश्व नहीं तो कम से कम भारतीय राजनीति अधूरी जरुर रहे। पर सोच उल्टी हो गयी। कांग्रेस आज अधूरी होती चली जा रही है। इस अधूरेपन को कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ समझ चुके हैं और युवा परेशान हैं। पर इस परेशानी से निज़ाद कैसे पाया जायेगा यह चिंतनीय विषय बन चुका है। 
इस वर्ष के अंत में और अगले वर्ष 2016 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।
 
 
 
 ऐसे में एक मुखौटे की आवश्यकता नहीं बल्कि पार्टी को एक ऐसे खेवनहार चाहिए जो इस डूबती कश्ती को पार लगा सके। पार्टी का वर्चस्व कैसे अपने आत्मसम्मान को बचायेगा। पार्टी एक तरह रसे तहस नहस हो चुकी है। प्रियंका गांधी के पति राबर्ट्र वार्डरा का नाम घोटालों में फंस चुके हैं। बोफोर्स घोटाला में भी गांधी परिवार का नाम खींचा जा चुका है। ऐसे में सफेद चादर कहीं न कहीं कलंकित हो चुकी है। जिसे अब सतरंगी बन जाने में ही भलाई है। पार्टी अंदरुनी गुटबाजी और आकार में वृहद होने से अब इस सत्ता को संभाल कर रखना चुनौती बन चुकी है गांधी परिवार के लिए। उधर गांधी परिवार अपनी जागीर को पुराने सामंतवादी तरीके से हथिया कर रखना चाहता है। अपने चिराग को एक पुश्तयनीय साम्राज्य का तिलक कर देना चाहती हैं। राजकुमार तो जयपुर के अधिवेशन में घोषित हो चुके थे अब प्रेसिडेंट की जिम्मेदारी देने को आमादा हैं सोनिया गांधी। इसका प्रतिबिंब स्पष्ट झलक रहा है। युवाओं को आकर्षित करने में असक्षम राहुल गांधी पुराने और अनुभवी नेताओं को कैसे संभालेंगें। 2014 के लोकसभा चुनाव में राहुल की अहम जिम्मेदारी खिसक कर अध्यक्षा सोनिया गांधी और बहन प्रियंका के ऊपर ही आ पड़ती है। शायद राहुल गांधी को अपनी जिम्मेदारी का एहसास ही नहीं है। ऐसे में प्रियंका गांधी जिसमें पूरी दुनिया को कहीं न कहीं इंदिरा गांधी नजर आती है आगे आना ही चाहिए। अन्यथा राहुल और कांग्रेस सूखे पत्ते की तरह पतझड़ के पहले ही पेड़ से गिरकर किसी के पैरों की धूल बनकर रह जायेंगें।

Thursday, 26 February 2015

दिल्ली  की नैया पर सवार- केजरीवाल!!




सर्वमंगला मिश्रा
9717827056


विश्वास जीवन का आधार होता है। केजरीवाल अब दिल्ली के दिल में काबिज़ हो चुके हैं। कहा जाता है कि  तकदीर आपको जीवन में एक मौका जरुर देती है। पर इतिहास गवाह हो गया है । केजरीवाल को दिल्लीवासियों ने या उनके नसीब ने उन्हें दूसरा मौका दे डाला है। जिन्दगी हर किसी पर मेहरबान तो नहीं होती पर केजरीवाल जी पर जरुर मेहरबान लगती है। करप्शन के खिलाफ उठी आवाज दिल तक मात्र पहुंची नहीं थी बल्कि दिल में घर कर गयी थी। तभी दूसरा मौका देने की जहम़त दिल्लीवासियों ने उठायी थी। दिल्ली विधानसभा एक साल पहले भंग हुई थी। अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा दिया था। दिल्ली पर राष्ट्रपति शासन लागू हो गया था। केजरीवाल का मुख्यमंत्री का मिशन परवान चढ़ गया था। 15 फरवरी से लोकसभा चुनाव के प्रचार में जुट गये थे केजरीवाल। पर, देश का नकरात्मक रवैया उन्हें एक सबक सीखा गया। काम से बड़ी कुर्सी नहीं बल्कि कुर्सी से बड़ा काम होता है। एक नयी पार्टी जिसकी आधारशिला के दौरान ही काफी असंतोष व्याप्त हो गया था। दिल्ली की जनता ने एक इनकम टैक्स आफिसर, समाज सेवी पर भरोसा किया और दो दिन देश के नाम का नारा साकार हुआ। नयी पार्टी आम आदमी पार्टी को 28 सीटें मिलीं थीं और ठीक साल भर बाद 67 सीटें। यह बदलाव कैसे ? जहां पार्टियों को सालों साल लग जाते हैं जनता का भरोसा जीतने में, अपनी छवि गढ़ने में वहीं केजरीवाल ने ऐसा क्या कर दिया कि जनता उसे भूल न सकी। जहां एक एम एल ए, एम पी को छवि बनाने में दो दशक लग जाते हैं। वहीं अरविंद केजरीवाल पद छोड़कर बीच मझधार में जनता को छोड़ने के बावजूद पूर्ण बहुमत से सरकार में बैठने का सुनहरा अवसर दे दिया है। अब अरविंद केजरीवाल के सामने मजबूत चुनौतियां सामने खड़ी हैं। दिल्ली से भ्रष्टाचार को दूर करना इतना सहज नहीं है। जहां कभी 40 हजार की जनसंख्या वाला यह शहर हुआ करता था वहीं पिछले साल तक इसकी जनसंख्या में जबरदस्त उछाल आया है। हालांकि यह उछाल एकदम से नहीं हुआ। पर, पिछले 10 सालों में दिल्ली के प्रति एक अचंभित कर देने वाला ग्राफ जरुर नजर आता है। अब दिल्ली में तकरीबन 17,838,842 लोग रहते हैं। जो दिल्ली की कपैसिटी से शायद कहीं ज्यादा है। इसका भी असर पड़ता है विकास पर। दिल्ली शहर पर अधिक लोगों का बोझ अर्थात् अतिरिक्त बोझ हर क्षेत्र में।  पिछली बार 700 लीटर पानी मुफ्त, बिजली के बिल में कटौती करना दिल्लीवासियों को भाया और कहीं न कहीं मतदाता लाभान्वित हुए थे। जिसके कारण 49 दिन का ट्रेलर को अब पांच साल की पूरी फिल्म में तब्दील कर दिया है। जनता ने यह फैसला सोच समझ कर लिया है। इसकी मंशा स्पष्ट है। केंद्र शासित सरकार अगर दिल्ली पर भी काब़िज हो जाती तो इतिहास निरंकुश शासकों और शासन का गवाह रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी भले यह कहते रहे हों कि जो पूरा देश चाहता है वही दिल्ली भी चाहती है। पूर्ण बहुमत वाली सरकार दिल्ली को दीजिए। आज केंद्र की कुर्सी पर पदासीन हुए मोदी जी को अमूमन आठ महीने हो चुके हैं। भारत को कांग्रेस शासित और वंशावली की विरदावली से मुक्ति तो अवश्य मिली है। परन्तु देश की दशा आज भी पूर्ववत है। भ्रष्टाचार मुक्त भारत की रचना इतना आसान नहीं जितनी आसानी से मोदी जी अपने भाषणों में बोल देते हैं। स्वच्छता अभियान इतने जोर शोर से छेड़ा गया। अंबानी, तेंदुलकर से लेकर तमाम बड़ी हस्तियों ने अपने हाथ में झाड़ू उठाया। फलस्वरुप कुछ निजी संस्थाओं ने कम बढाकर स्वच्छता अभियान को मजबूती प्रदान करने की कोशिश जरुर की है। सच्चाई यह भी है कि महानगरों में रहने वाले लोग अब तक इसे अपने जीवन में ढाल पाने में असमर्थ दिख रहे हैं। तो ग्रामीण इलाकों तक पहुंचते स्वच्छता अभियान का रथ सूर्यास्त न देख ले। दीपावली जम्मू के भाई बहनों के साथ कई बार मनायी मोदी जी ने। पर, चुनाव के बाद कितनी बार उन्हें उनकी याद आयी। मोदीजी के अनुसार हर राज्य का एक धागा कहीं न कहीं गुजरात से जुटा है लेकिन हर इंसान के दिल का धागा उसके अपने शहर और गली मोहल्ले से जुड़ा होता है।

अब दिल्ली जो पूरे देश से कहीं बहुत भिन्न है। अपने अंदाज के लिहाज से, अपने कामकाज के लिहाज से। दिल्ली जिसकी शान मात्र हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में छायी हुई है। अब नायक मुख्यमंत्री बन चुके हैं। परिवर्तन का कारनामा दिल्ली को छेदकर विश्व में कीर्तिमान हासिल करेगा अथवा धरने वाली सरकार बनकर रहेगी। जाहिर सी बात है अगले साल कई महत्तवपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी अपने उम्मीदवार खड़े करने का दम्भ फिर भरेगी या शांतिपूर्वक दिल्ली पर पूर्ण बहुमत देने वाली जनता के प्रति सौ प्रतिशत वफादारी दिखाने का काम करेगी। केंद्र में पीठासीन पर दिल्ली में शासनविहीन केंद्र सरकार की मुश्किलें अब बढेंगीं। निरंकुशता के पर कतर दिये ये हैं। कार्यों में तेजी और सत्यापन स्थापित करना होगा। अन्यथा एक दशक तक राज करने की मंशा अधूरी रह जायेगी। शासक का तात्पर्य मात्र यह नहीं होता कि देश को  केवल मानसिक मजबूती दे और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने नाम का आतंक फैलाये। स्वशासन मात्र गुलामों के भरोसे नहीं आ सकता।

हर राज्य, देश को चलने और चलाने का यही नियम है कि विरोधी को खड़ा होने दीजिए। विरोध हर उस पक्ष को दर्शाता है जहां सत्ता पक्ष हिचकिचाती है। जयललिता-करुणानिधी, शिवराज- दिग्गी, ममता बनर्जी -ज्योति बसु, लालू-नीतीश, कांग्रेस-बीजेपी; विरोधी से सत्ता पक्ष पर अंकुश बना रहता है। पहले भी दिल्ली की जनता ने केंद्र और राज्य में एक ही सत्ता को देख चुकी है। जिसका फल हजारों घोटालों ने जन्म लिया। वजह स्पष्ट थी करने वाले और बचाने वाले एक ही परिवार के सदस्य रहे। जनता भी इस राजनीति को समझ गयी और दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है। इसलिए, केजरीवाल को पूर्ण बहुमत से दिल्ली की सत्ता पर काब़िज कर डाला है। ताकि फिर से कोई टूजी के स्थान पर फोरजी घोटाला न हो।

केजरीवाल का वायदा दिल्ली में वाई फाई की सेवा हर मुमकिन स्थान पर। गरीब बच्चों के लिए कालेज तो साथ ही ऋण की सुविधा भी मुहैया करायेंगे।भविष्य बच्चों का संवारकर दिल्ली को सवारेंगें। नयी तकनीक से देश को पहला भ्रष्टाचार मुक्त राज्य प्रदान करेंगे। दिल्लीवासियों की आस भी अब केजरीवाल से जुट गयी है। भरोसा एक बार टूटा था उम्मीद है दुबारा गल्ती क्षम्य न होगी और विश्वास नहीं पनपेगा। दिल्ली उम्मीद की आस फिर लगायी है कि दिल्ली सच में दिलवालों की होगी।    
नीतीश की रणनीति



सर्वमंगला मिश्रा



कौन कहता है कि खोया राज्य वापस नहीं मिलता ? इतिहास भले गवाह रहा हो नये इतिहास की संरचना करने में । सच यह भी है कि सिकंदर ने पूरे विश्व पर विजय तो प्राप्त की थी पर संभाल कर न रख सका। फलस्वरुप, राजाओं के घुटने टेक देने के बाद राज्य उन्हें वापस लौटा दिया गया था। भारत विविधताओं से भरपूर है। यहां संस्कृति से लेकर विश्वास भी आत्मसाथ होने के साथ साथ अलग अलग हो जाता है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही कुर्सी मांझी के झोली में डाल दी थी। क्योंकि नीतीश कुमार के सामने मोदी के प्रधानमंत्री के पद को संभालने के उपरांत अनकही परेशानियां मंडराने लगी थी। सम्मान, अपमान के वशीभूत होकर नीतीश ने किनारा कस लिया था। फलस्वरुप मुख्यमंत्री पद जिसतरह लालू यादव ने अपने चारा घोटाला में फंसने के बाद अपनी पत्नी को उत्तराधिकार दे दिया था। 1997 का वो साल और 2014 का साल बिहार में याद किया जाने वाला बन गया है। जीतन राम मांझी के दिन ही फिर गये और रातों रात वह मुख्यमंत्री जैसी कुर्सी के दावेदार ही नहीं बल्कि विराजमान हो गये। शंहशाह रातों रात। पर सपना तब टूटा जब नीतीश ने अपना धन जो जीतन को बतौर अमानत के रुप में दिया था और सालों बाद आकर वापस मांगने लगे। तब तक जीतनराम को ऐशोआराम की आदत लग गयी थी। अब मन में पाप जग गया था। जीतन राम मांझी को कुर्सी से प्रेम हो चला था। सत्ता का मोह उनके मन को जकड़ चुका था। पर, नीतीश शतरंज के माहिर खिलाड़ी हैं। उन्हें पता है कि कब शह और मात का खेल खेला जाना चाहिए। सही वक्त के इंतजार में नीतीश ने 20 मई 2014 से 20 फरवरी 2015 तक का इंतजार कर सही वक्त पर मात दे डाली। यह वक्त तब उन्हें सही लगा जब भाजपा का मनोबल कहीं न कहीं टूटता हुआ सा महसूस हुआ। जम्मू और कश्मीर में सरकार अब तक न बन सकी। साथ ही सबसे बड़ी हार का मुंह केजरीवाल ने दिखा दिया। प्रधानमंत्री मोदी जहां अपने हर प्रचार में यही कहते नज़र आये कि जो पूरा देश चाहता है वही दिल्ली भी चाहती है। पूर्ण बहुमात वाली सरकार को वोट दीजिए। दिल्ली की जनता दिल से नहीं दिमाग से सोचती है। यह बात मोदी जी भी अब समझ गये होंगें। मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही नीतीश को विशेष राज्य का दर्जा ठंडे बस्ते में मरता नज़र आने लगा था। दोस्ती जो कभी दोस्ती हुआ करती थी। मीजिया के सामने आयी तस्वीरों ने साफ कर दिया था कि दोस्त दोस्त ना रहा बल्कि अब राजनैतिक विरोधी पक्के वाले दोनों हो चुके हैं। इस बात की छवि पूरी दुनिया ने देखी। नीतीश गुजरात नहीं गये तो मोदी अपने लोकसभा चुनाव के प्रचार के लिए बिहार की धरती को नमन तो किया पर बन्दुकों के साये में। गुजराती पुलिस पर उन्हें ज्यादा भरोसा रहा और अपने दल बल के साथ मार्च करते आये और प्रचार कर वापस भी गये। लोस के चुनाव में खूब गरजने वाले मोदी अपने तहेदिल करीबी दोस्त से पल पल आखें चौकन्नी करते भी नजर आये। कई जगह मिले तो मिले पर ना मिले। सत्ता और बल से बड़ा राजनीति में कुछ नहीं होता।

आज भले नीतीश कुमार यह कह रहे हों कि भाजपा सत्ता की भूखी है और सत्ता पाने के लिए कुछ भी कर सकती है। तो आत्म-मंथन की आवश्यकता उन्हें भी है। सत्ता पर अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए ही उन्होंने जीतन राम मांझी का सहारा लिया और समय के पलटते ही उन्हें उनकी औकात भी याद दिला दी। नीतीश शपथ लेकर फिर अपने अंदाज में राज करेंगें। भाजपा के सपनों को चकना चूर कर देने वाले नीतीश को टक्कर अब भी मोदी से ही लेनी होगी। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा केंद्र की अनुमति के उपरांत ही मिल सकेगा। रास्ता सीधा नहीं है। 70 वर्षीय मांझी मात्र कठपुतली थे मनमोहन सिंह की तरह, राबड़ी की तरह। जिसे सत्ता पर काबिज़ तो कर दिया गया पर हाथ काट दिये गये जिससे वह कुछ लिख न सके। मुसहर जाति के मांझी के पिछड़े वर्ग से आने के कारण ही किसी ने नीतीश के गेम प्लान पर संदेह न कर सफल होने दिया। सियासत और सत्ता का प्रगाढ़ प्रेम पल पल अपना रुप रंग बदलता, निखारता और संवारता रहता है। नीतीश कुमार जो 70 सावन से अमूमन सात साल दूर हैं। राजनीति रणनीति के माहिर दोनों खिलाड़ी अब फिर से मैदान में आमने सामने हैं। जीवन में सत्ता की संलिप्तता कितनी किसमें समायी है। यह आने वाले समय में दिखेगा। अपने हनीमून कम सेट्रैटेजी परियड के दौरान नीतीश किस रणनीति के तहत वापस अपनी गद्दी पर काबिज़ हुए हैं।

भाजपा के साथ रहने वाले नीतीश ने मात्र इसलिए किनारा कसा क्योंकि मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया गया था। नीतीश स्वयं भी उन दिनों प्रधानमंत्री बनने का सपना बुन रहे थे। नीतीश एक मजबूत प्लान के साथ सामने आये हैं जिससे उनका वर्चस्व कायम हो सके। आने वाले समय में विधानसभा चुनाव पर अपनी मजबूत दावेदारी भी पेश कर मोदी और भाजपा दोनों को कड़ी टक्कर देने के लिए मोदी जैसा परिपक्व प्लान होना नीतीश के पास अनिवार्य है। मोदी के प्लान में कहीं न कहीं तार अब ढीले पड़ रहे हैं। लांग डिस्टेंस लव फलीभूत नहीं होता। इसलिए बंगाल, बिहार और उड़ीसा के इलाके भाजपा के हाथ पूरी तरह नहीं है। इन तीनों राज्यों में लोकल पार्ट्रीज का ही प्रभुत्व बना हुआ है। गांधी मैदान में भाषण देने से यह साबित नहीं हो जाता कि जनता आपके पक्ष में आ गयी है। जनता के आशीर्वाद के लिए ओबामा, क्लींटन और मोदी की तरह प्लान से चलना पड़ता है। नीतीश के फूले और चमकते गाल के पीछे कितनी गहरी रणनीति जन्म ले चुकी है यह तो शपथ के दिन से ही सामने आ जायेगा। हालांकि सुशील मोदी की आकांक्षा की परीक्षा दूर तलक तक जायेगी। हार की हवा जब उत्तर से उठी है और पूर्व से होते हुए दक्षिण और कहीं आने वाले समय में पश्चिम तक न पहुंच जाये। दिल्ली से उठी यह कंपकपाहट गर्मी के मौसम में कितनी सर्द का एहसास करायेगी भाजपा को या ब्लड प्रेशर बढाने का काम करेगी यह तो नीतीश की पकी हुई राजनीति ही तय कर सकेगी। फ्लोर टेस्ट में फेल मांझी अब अपनी नैया किस ओर ले जायेंगें या हवा का रुख उन्हें स्वयं बहायेगी। रणनीति रण में आने पर नहीं बनती बल्कि मानस पटल पर अंकित रहती है।

Sunday, 28 December 2014

                                                   नारी


सर्वमंगला मिश्रा- स्नेहा
9717827056

चिंतन-मनन के उपरांत उस पर क्रियान्वयन का होना अति आवश्यक होता है। प्राचीनकाल से लेकर अब तक हम न जाने कितने मुद्दों पर चर्चा करते चले आ रहे हैं। पर चर्चा सिर्फ चर्चित होती है। उस पर गतिशील तरीके से समाज कदम से कदम मिलाकर चल नहीं पा रहा। अर्थात् कहीं न कहीं वैचारिक मतभेद एवं अपरिपक्वता व्याप्त है। विश्व आज एक –एक करके सभी दहलीजें पार कर रहा है। हर ऊंची दीवाल को फांदने की कूबत रखने वाला इंसान आज इंसान से ही नफरत करता है। फिल्मी अदाकारा माधुरी दीक्षित से लेकर कई सरकारों ने महिलाओं के लिए असीम योगदान देने का बीड़ा उठाया। जिससे भ्रूण हत्या कम हो। लिंग परीक्षण को भी सरकार ने वैध करार दिया। उसके बावजूद आज भी शहरों में और गांवों में कन्यायें गर्भ में ही दम तोड़ देती हैं।

महिलायें जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती चली आ रहीं हां चाहे वो रानी लक्ष्मीबाई, मातंगिनी हाजरा या इंदिरा नूई हों। समाज दुर्बर्लों का नहीं होता। जिसने अपनी लड़ाई लड़ी देश, समाज उसका हुआ। देश के सर्वोच्च पद पर इंदिरा गांधी ने इतिहास रच डाला। मायावती दलित समाज का गौरव और तीन बार मुख्यमंत्री बनना सचमुच एक सम्मान की बात है। जे. जयललिता अदाकारा से पुष्ट और कठोर राजनीति के लिए जानी जाती हैं। ममता बनर्जी जो जमीन से उठी बंगाल की बेटी ने देश के गरीबों के हित को समझने वाली पार्टी के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की और बताया कि बंगाल की असल हितैषी वो खुद हैं। सुषमा स्वराज, अल्प काल के लिए ही सही दिल्ली की मुख्यमंत्री बनी। सोनिया गांधी के विरुद्ध उन्हें दक्षिण भारत से उतारा गया। आज विदेश मंत्री के पद पर मोदी जी के शासन में आसीन हैं। उमा भारती, स्मृति इरानी, मेनका गांधी तमाम ऐसे नामों की फहरिस्त है जिन्होंने अपनी लड़ाई खुद लड़ी और विजयी भी रहीं। एक स्वंय सेवी संस्था ने महिला सशक्तिकरण के कार्यक्रम में सुषमा स्वराज और मिनाक्षी लेखी जैसी हस्तियों को आमंत्रित किया था। मिनाक्षी लेखी जो बीजेपी की प्रवक्ता हैं। उन्हें यह बताने में तनिक भी संकोच नहीं हुआ कि जब उनके घर में कोई मेहमान आता है तो उनके दोनों बेटे मेहमाननवाजी करते हैं। सुषमा जी ने अपने रिसर्च के बारे में बताया कि जब मुझे पता चला कि महिला कमजोर होती है तो यह पाया कि शेर जंगल का राजा होता है पर शिकार शेरनी करती है। उसी प्रकार झुंड में चलने वाले हाथियों का मार्गदर्शन बूढ़ी हथिनी करती है। जो सूंड उठाकर खतरे को भांप लेती है। तो ऐसे में महिला कमजोर कैसे हो सकती हैं। उसे शक्ति की आवश्यकता ही क्यों है ?  जब वह स्वयं शक्तिस्वरुपा है। बात चल रही थी कि महिलाओं को क्या वास्तविक रुप से शक्ति की आवश्यकता है या जगरुक होने की अपने हक के प्रति।

देश मंगल ग्रह तक पहुंच चुका है। पर, महिलाओं के मंगल की बात कम लोग ही अन्तर्रात्मा से स्वीकार कर पाते हैं। एक समय था जब एक ब्याही गयी कन्या का उसके माता- पिता से सदा सर्वदा के लिए रिश्ता समाप्त सा हो जाता था क्योंकि उस वक्त जागरुकता मिट्टी में दबी हुई थी। आज जागरुकता की इमारत खड़ी होने के बावजूद भी उसका पता कम लोगों को ही पता है। आज जीवंत उदाहरण है कि तीन ब्याही गयी लड़कियां शादी के तुरंत बाद ही वापस अपने मायके आ गयीं क्योंकि उनके यहां शौचालय का प्रतिबंध नहीं था। ये जागरुकता है जो देश में संचालित हो रही योजनाओं पर अब गांवों तक की भी नजर है। महिलाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हो इसके लिए मध्य प्रदेश सरकार की लाडली योजना और तमाम ऐसी योजनायें शामिल हैं।पर सवाल उठता है कि क्या इस प्रयास के बावजूद समाज और परिवार महिलाओं का सम्मान करना सीख पाया है ? जवाब में असंतोष अवश्य छिपा है। आज देश में महिलाओं का सम्मान वास्तविक तौर पर होता तो 16 दिसम्बर और हाल ही में दिल्ली में एक और हादसे ने जहां विदेशी कंपनियों द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। बड़े- बड़े विज्ञापन, सुरक्षा के वायदे ऐसी घटनाओं के बाद सत्यता की परख हो जाती है कि अपना व्यापार उज्जवल दिशा में बढ़े इसके लिए खोखले वायदों के सब्ज बाग दिखा जिये जाते हैं जिसतरह नगर निकाय चुनाव से लेकर लोकसभा चुनावों में नेतागण खोखले वायदे करने से नहीं चूकते। पर पांच साल बाद जब वही नेता अपने इलाके में आता है तो झूठ की नयी परत और मुखौटे के साथ आता है। साल आते हैं मुखौटा बदलता चला जाता है। दूसरा सवाल यह उठता है कि क्या हर गुनाह की भरपायी मुआवज़ा होता है? सरकार हो या कंपनियां मुआवज़ा देकर मामला रफा दफ़ा करने में यकीन रखती हैं। दिल्ली हादसों का शहर बन गया है। सिर्फ दिल्ली क्यों उत्तर प्रदेश हो या बिहार, बंगाल या दक्षिणी प्रांत। समस्या एक है कि लोगों की मानसिकता उनका नज़रिया कैसे बदला जाय? क्योंकि जबतक इंसान की सोच शुद्ध नहीं होगी तब तक मानसिकता समृद्ध नहीं होगी। स्वस्थ मस्तिष्क ही समाज को स्वच्छता से रख सकता है। संकीर्णता कुरुपता को जन्म देती है। जिससे स्वस्थता बीमारी की ओर अग्रसर हो जाती है। फलस्वरुप प्रवृत्ति कोमा और आसीयू में चली जाती है। जहां स्वस्थता डाक्टरों के हाथ की कठपुतली बन जाती है और स्वस्थता के पुजारी सिर्फ प्रार्थना करते रह जाते हैं। देश और समाज की ऐसी दुर्बल स्थिति ना हो इससे पहले पहल करना अनिवार्य हो गया है। जिसकी शुरुआत घर के अंदर से होनी आवश्यक है। माताओं और घर के बड़े बजुर्गों को पहल करनी होगी। सीखाना होगा सम्मान दोगे तभी सम्मान पा सकोगे।

एक नेता का बयान आया था कुछ दिन पहले की हर महिला के पीछे हम पुलिस नहीं लगा सकते। बंगाल के नेता ने कहा- जब तक संसार है- दुष्कर्म की घटनायें घटती रहेंगी। हम कठोर प्रावधानों की मांग न करके उन लोगों को ऐसे बयानों से बल मिलता है। हर बार घटी घटनाओं को लेकर पूरा देश स्तब्ध रह जाता है। पर परिणाम शून्याकार ही रहता है। इन घटनाओं पर फिल्म इंडस्ट्री को पहल करनी चाहिए। देश और युवा उसके प्रशसंक और पद चिन्हों पर चलने में गर्व की अनुभूति करते हैं। उनके पास निर्णय करने की क्षमता नहीं होती। इसलिए हर बच्चे को तहज़ीब देनी होगी। तभी युवा होने पर उसके रक्त में वह अनुभूतियां विद्दमान रहेंगी। जिससे शिष्टाचार उसे गलत पथ पर जाने से रोकेगा। समाज ऐसे पथ पर चल चुका है जहां वयोवृद्ध महिलायें भी असुरक्षित एवं असहाय हैं। कभी किसी बलवान ने बदले की भावना से किया तो कभी कुदृष्टि के चलते। पर बदला लेने का यह कौन सा तरीका है जहां मानवता खुद शर्मसार हो जाये। आप अपने घर में अपने ही बड़े –बूढों और परिवार जन से नज़रें मिलाने के काबिल न रहो। द्रौपदी से लेकर आज दिल्ली तक महिला अपमान के बोझ तले दबती और सहमती चली जा रही है। जिनके सपोर्ट मेंपुरुष हैं वो महिलायें तो ज्ञानार्जन से लेकर अपने हक की लड़ाई लड़ लेती हैं पर जिन्हें ऐसा सौभाग्य नहीं मिला तो उन्हें बलहीन दुनिया घोषित करेगी ? मलाला –एक छोटी सी बच्ची जिसने विश्व में बच्चों के लिए मुहिम छेड़ी तो नोबल पीस प्राइज़ की हकदार भी। आज उसके पीछे तमाम बन्दूकें तनीं सी हैं पर उसके पिता उसके असल सहायक एवं मार्गदर्शक हैं। वहीं दूसरी लड़कियां जिनके परिवार में कोई मर्द नहीं हैं वो घर के बाहर पैर तक नहीं रख सकीं पढ़ना तो दूर है। गांव से लेकर शहर तक अब यह कदम हर लड़की और महिला को उठाना होगा अपने बेटों को शिक्षित करना होगा। शिष्टाचार की पढ़ाई का स्कूल खोलन होगा।  
इतिहास में सीता, कुन्ती और जीजा बाई  ऐसी उदाहरण हैं जिन्होंने अपने बेटों को ऐसी शिक्षा एवं संस्कार दिये जिससे संसार में आज भी लव -कुश का  नाम सम्मान से लिया जाता है। यह सीता माता की शिक्षा का ही परिणाम था कि अपने दोनों बेटों को पथ भ्रष्ट होने से बचाया  अनैतिकता से कोसों दूर रखा। वहीं कुन्ती ने भी अपने पांच पुत्रों को शिक्षा और संस्कार देकर मिसाल कायम की। शिवाजी की माता के संस्कार जगत विख्यात हैं।  वहीं गांधारी ने अपने पुत्रों दुर्योधन और दुशशासन जो सदा अपने मामा शकुनी के साथ समय व्यतीत करते थे। एक उनकी शिक्षा और एक माता कुन्ती की। दोनों उदाहरण हमारे सामने हैं।  इसी तरह आज हर नारी को सिर्फ माता नहीं वरन सीता के समान सोच, कुन्ती समान पालन और जीजा बाई जैसी शिक्षा प्रदान करने का संकल्प लेना होगा। तभी देश उन्नत हो सकेगा। वरना लड़के लड़के हैं यह सोच उन्हें सही मार्ग से भटका देगी। माता एवं पिता दोनों का कर्तव्य होता है कि लड़कों को भी लड़कियों जैसा उचित संस्कार एवं शिक्षा से अवगत करायें। 

  मिस्टिरियस मुम्बई  में-  सुशांत का अशांत रहस्य सर्वमंगला मिश्रा मुम्बई महानगरी मायानगरी, जहां चीजें हवा की परत की तरह बदलती हैं। सुशां...