आकाश कैसे बंध गया?
सर्वमंगला मिश्रा
उद्धव का उद्भव
आखिरकार हो ही गया। जिस ठाकरे परिवार के आगे आज भी जनता झुकती है
उद्धव ठाकरे ने शपथ समारोह में शपथ लेने के बाद मंच पर सिर झुकाकर जनता को नमन
किया। इस विश्वास के साथ कि आज भी महाराष्ट्र की जनता उद्धव और शिवसेना को उसी तरह
देखती है, जिसतरह वो बालासाहेब को देखती थी। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार
तिकड़ी में बन तो गई है और साथ ही एक इतिहास भी रच चुकी है। देवेन्द्र फड़नवीस का
इस्तीफा देना अपने आप में पर्दे के पीछे की रहस्यमयी कहानी है। अमित शाह का वचन अब
झूठा साबित हो गया। महाराष्ट्र चुनाव के पहले से शाह ने मुख्यमंत्री के तौर पर
देवेन्द्र को ही देखा था। कारण यह था कि महाराष्ट्र की सरकारों में आजतक कितना
उलटफेर हो चुका है इतिहास इसका गवाह है। भाजपा की छत्रछाया में देवेंद्र फड़नवीस
ने पांच साल का कार्यकाल बखूबी पूरा किया। एक स्थिर सरकार राज्य को दी। राज्य में
विकास का आंकाड़ा कहां तक पहुंचा इसकी विवेचना एक लम्बी बहस का मुद्दा है।
राजनैतिक विवेचनाकार इस बात की अलग अलग तरीके से आलोचना या प्रशंसा करेंगे। पर बात
यहां ठाकरे परिवार की है जो बिना ताज बादशाह अब ताज पहन के सीमाओं में घिर गया है।
जाहिर है जहां सीमा और गठबंधन होगा वहां समस्याएं भी आंतरिक रुप से होंगी।
बालासाहेब ठाकरे
जिसने एकछत्र अखंड राज किया जो सभी सीमाओं से ऊपर उठकर हिन्दुओं की रक्षा हेतु
सामने आए और विकल्परिहत समाज के सामने एक विकल्प के रुप में उभरे। 1966 में शिवसेना
की स्थापना की। राजनैतिक पद की लालसा तब भी शायद कहीं मन में उठी थी तभी कांग्रेस
के साथ सामने आए थे बालासाहेब ठाकरे। पर, कांग्रेस की फितरत कहें या राजनैतिक
दावपेंच बालासाहेब भी धोखा खाए और अपनी पार्टी का अस्तित्व स्वयं खड़ा किया।
सम्पूर्ण महाराष्ट्र में बालासाहेब ने निरंकुश शासन किया बिना किसी पद की गरिमा को
स्वंय या अपनी पार्टी पर लपेटे हुए। देखा जाए तो उद्धव ठाकरे भी अपने पिता के
प्रभाव से वंचित नहीं रह पाए और राजनीति में शांति से प्रवेश कर पिता का अनुसरण
करने लगे। पार्टी को दिशा देने का काम उन्होंने बालासाहेब ठाकरे से ही सीखा। उद्धव
के चचरे भाई राज ठाकरे कुछ आक्रामक नीतियों का अनुसरण करने में यकीन रखते थे। मीडिया
राज ठाकरे को ज्यादा तवज्जो देती थी। जनता को भी राज ठाकरे बालासाहेब के
उत्तराधिकारी के रुप में दिखते थे। उद्धव ठाकरे ने इन बातों का कभी खंडन नहीं किया।
जो भी समस्याएं रही वो आंतरिक रुप से ही रहीं। यह सत्य है कि बालासाहेब ठाकरे ने
अपने पोते आदित्य ठाकरे को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था क्योंकि बालासाहेब को
अपनी झलक अपने बड़े पोते में झलकती रही होगी।
साल 2019, जब
महाराष्ट्र के बेताज बादशाह के परिवार ने मैदान में आम नेता की भांति घर घर जाकर
वोट मांगने का निर्णय किया। अर्थात् चुनावी मैदान में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की
आवश्यकता ठाकरे परिवार को महसूस हो ही गई। आदित्य भी नए दांव पेंच सीखने में जुट
गए हैं। आखिर उद्धव ठाकरे की अगली पीढ़ी हैं जो शिवसेना को दिशा देने के लिए तैयार
हो रहे हैं। युवा नेता को अपने पिता से ना सिर्फ राजनैतिक लूड़ो खेलने की शिक्षा
प्राप्त होगी वरन कहां पहुंचकर सीढ़ी मिलेगी ये भी भलीभांति सीख जाएंगे। उनके पिता
ने उन्हें विधानसभा के चुनाव में मुख्यमंत्री के पद के दावेदार के रुप में उतारा
था बल्कि एनसीपी और कांग्रेस के साथ समझौते के दौरान एक बार उन्होंने अपनी नामंजुरी
जाहिर की। जिससे यह तो स्पष्ट झलक रहा था कि वो स्वंय बालासाहेब की कुर्सी पर रहकर
बेटे के हाथ सत्ता देकर दोहरी राजनीति कर सकते थे। लेकिन आदित्य राजनीति में एक
हरे पौधे के समान हैं जिन्हें विरासत में राजनैतिक माहौल तो मिला है पर स्वंय को
परखना और उन पायदानों पर चलने की कूबत स्वयं हासिल करनी होगी। जाहिर है कि
दिग्गजों के सामने आदित्य बच्चे हैं और एनसीपी जिसमें शरद पवार की बेटी सुप्रिया
सुले और कांग्रेस के अशोक चौहाण जैसे लोग इस बात को मानने से साफ इंकार की हरी
झंड़ी दिखाई जिससे सत्ता और विरासत को अमिट कलंक से बचाने के लिए उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री
का पद स्वीकार किया।
भविष्य के बादल में
क्या छिपा है इसको भांपते हुए उद्धव ने सेक्यूलर और हिन्दुत्व सबको ताख पर रखना ही
उचित समझा। यह बात अलग है कि उद्धव और राज के मन में मुख्यमंत्री के पद को पाने की
लालसा और होड़ दोनों मच चुकी थी। पर व्यक्ति अपने पुत्र में अपना आज देखता है वही
उद्धव भी करना चाहते थे। महाराष्ट्र का मराठी मानुष ठाकरे परिवार के आगे सालों से
सिर झुकाता आया है। इस पल का साक्षी पूरा महाराष्ट्र हो जाता कि सत्ता हाथ से निकल
गई। जिससे वर्षों की बालासाहेब की तपस्या मिट्टी में मिल जाती और इसी तपस्या को
बचाने के लिए उद्धव ठाकरे बंधन में आ गए। इन बंधनों की पकड़ सिर्फ बाहर से ही
मजबूत रहेगी या आंतरिक तौर पर भी हो पाएगी। इसके लिए शतरंज की अगली चाल का इंतजार
करना ही होगा।